सभी लोग अपनी सोच और व्यवहार में अपने "गतिशील अचेतन" या विचारों, यादों और भावनाओं के संग्रह से प्रभावित होते हैं, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं होती है। लोग अचेतन विचारों, इच्छाओं या भावनाओं के जवाब में रक्षा तंत्र विकसित करते हैं जो सतह पर आने पर उन्हें चिंता या शर्म का अनुभव कराते हैं। रक्षा तंत्र में इनकार, विनाशकारी सोच पैटर्न, दमन, और बहुत कुछ शामिल हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पूर्वचेतन मन और व्यक्ति की सचेत मान्यताओं के बीच संघर्ष के परिणामस्वरूप होती है। मन अक्सर इन प्रतिस्पर्धी इच्छाओं और लक्ष्यों के लिए "समझौता" विकसित करने का प्रयास करता है। ऑस्ट्रियाई न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रायड ने 19 वीं शताब्दी के अंत में मनोविश्लेषण विकसित किया। आज, मनोविश्लेषण चिकित्सक लोगों को उनकी अचेतन भावनाओं और यादों को उजागर करने, सोच और व्यवहार के नकारात्मक पैटर्न की पहचान करने और पिछले आघात से उबरने में मदद करते हैं। मनोचिकित्सा, जिसे टॉक थेरेपी के रूप में भी जाना जाता है, लोगों को भावनात्मक संकट, तनाव, संघर्ष और मानसिक स्वास्थ्य विकारों का प्रबंधन करने में मदद करने का एक तरीका है। फ्रायड की मनोचिकित्सा की विधियों को मनोविश्लेषण, व्यक्तित्व विश्लेषण तथा व्यक्तित्व अध्ययन की प्रविधियों के नाम से जाना जाता हैं। अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (APA) के अनुसार "मनोविश्लेषण चिकित्सा का लक्ष्य उन सोच और व्यवहार के पैटर्न की पहचान करना है जो भावनात्मक संकट का कारण बनते हैं”।[1] मनोविश्लेषण सिद्धान्त की अध्ययन प्रविधियों के अंतर्गत निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है -
(5.6.1) मुक्त साहचर्य (Free Association)
(5.6.2) स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis)
(5.6.3) अंतरण विश्लेषण (Analysis of Transference)
(5.6.4) अवरोध विश्लेषण (Analysis of Resistance)
(5.6.5) स्पष्टीकरण (Interpretation)
5.6.1
मुक्त साहचर्य (Free Association)
फ्रायड द्वारा विकसित,
मुक्त संघ या मुक्त साहचर्य एक मनोविश्लेषणात्मक तकनीक है जिसमें
रोगी को चेतना की धारा में अपने दिमाग में जो कुछ भी है, उसके
बारे में खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित करना शामिल है। व्यक्ति के अचेतन में
दमित सामग्री सदैव बहार निकलने के लिए रास्ते खोजती रहती है। यह हमारे दैनिक जीवन
में आक्रामकता, कामुक मजाक और जबान फिसलना आदि माध्यम से
बाहर निकलती भी है लेकिन बड़ा पक्ष भीतर कुलबुलाहट मचाता रहता है। मुक्त साहचर्य के
माध्यम से परामर्शदाता रोगी को शांत करके उसके बाल्यकालीन यादों, भावनात्मक अनुभवों को बिना किसी हिचक के प्रकट करने को कहता है। वह उसे
प्रेरित करता है कि वह परामर्शदाता पर विश्वास करके सब प्रकट करे, कुछ न छुपाये। रोगी द्वारा प्रकट किये विचारों को सुसंगत होने की आवश्यकता
नहीं है। वह कुछ भी ऐसा प्रकट कर सकता है जिसकी कोई संगत न बैठती हो लेकिन अगर वे
प्रामाणिक हैं तो यह उसके निदान में बड़े काम की होती है। प्राचीन भारत में इससे
मिलती जुलती प्रक्रिया ग्रामीण से लेकर शहरी परिवेश में पाई जाती है जिसको कहा
जाता है "मन हल्का करना।"
डॉ. सिग्मंड फ्रायड 1892 से 1898 तक मुक्त जुड़ाव विकसित करने की प्रक्रिया
में थे। उन्होंने अचेतन की खोज के लिए इसे एक नई विधि के रूप में उपयोग करने की
योजना बनाई। यह इस संबंध में सम्मोहन की जगह लेगा। फ्रायड ने दावा किया कि मुक्त
संगति ने चिकित्सा में लोगों को उनके विचारों की जांच करने की पूर्ण स्वतंत्रता
दी। यह स्वतंत्रता, आंशिक रूप से, एक
चिकित्सक द्वारा संकेत या हस्तक्षेप की कमी से आएगी। फ्रायड ने प्रस्तावित किया कि
तकनीक ने चिकित्सा में तीन सामान्य मुद्दों को रोकने में मदद की -
Ø स्थानांतरण
- एक व्यक्ति के लिए दूसरे व्यक्ति में भावनाओं को
स्थानांतरित करने की प्रक्रिया।
Ø प्रक्षेपण
- अपने गुणों को किसी और पर प्रक्षेपित करने की
प्रक्रिया।
Ø प्रतिरोध
- कुछ भावनाओं या यादों को अवरुद्ध करने का अभ्यास।
एंड्री और बार्टन (2021)
अपने लेख Free association in psychoanalysis and its
links to neuroscience contributions में मुक्त साहचर्य के बारे
में अपने विचार लिखते हैं कि “मनोविश्लेषण में मुक्त संघ को
अपेक्षाकृत सीमित सचेत सेंसरशिप के साथ विचार की अभिव्यक्ति के रूप में वर्णित
किया गया है। तंत्रिका विज्ञान में, एफ० ए० को मस्तिष्क के
एक समूह के हिस्से के रूप में अध्ययन किया गया है और मानसिक गतिविधियों को सहज
मानसिक प्रक्रियाओं के रूप में जाना जाता है। वे स्वयं उत्पन्न और आवक-निर्देशित
अभिविन्यास के विचारों की सहज अभिव्यक्ति हैं। हम कह सकते हैं कि फ्री एसोसिएशन
उपचार में एक रचनात्मक चिकित्सीय परिवर्तन का कारण बन सकता है जो आत्मनिरीक्षण,
नैतिक और सामाजिक अनुकूलन का पक्षधर है”।[2]
5.6.2
स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis)
फ्रायड
के अनुसार स्वप्न व्यक्ति के अचेतन में विद्यमान दमित इच्छाओं का प्रतिफलन है।
स्वप्न में व्यक्ति जो कुछ देखता है, वे
सभी अचेतन में दमित इच्छाओं के एक छदम रूप होता है। इसके वास्तविक स्वरूप के बारे
में स्वप्न विश्लेषण से पता चल सकता है। स्वप्न के दो विषय होते हैं -
Ø व्यक्त
विषय (manifest content) -
व्यक्ति स्वप्न में देखी हुई घटनाओं का नींद खुलने पर प्रत्यक्ष वर्णन कर देता है।
Ø अव्यक्त
विषय (latent content) -
व्यक्ति द्वारा नींद खुलने पर वर्णित स्वप्न के छुपे हुए विषय और उनका अर्थ,
जिनका पता स्वप्न विश्लेषण से लगता है।
डॉ.
सिग्मंड फ्रायड का मत था कि व्यक्ति की अनैतिक, कामुक
एवं असामाजिक इच्छाओं की पूर्ति रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं हो सकती है इसलिए
व्यक्ति ऐसी इच्छाओं को अचेतन में दमित कर देता है और अचेतन में यह इच्छाएं समाप्त
नहीं हो जाती हैं वरन मौका पाकर चेतन में प्रवेश कर अपनी संतुष्टि चाहती हैं।
लेकिन अहं का सेंसर इन्हें चेतन में प्रवेश करने नहीं देता है तो यह व्यक्ति के
सोते समय अभिव्यक्त होकर अपनी संतुष्टि कर लेती हैं क्योंकि व्यक्ति की
सुप्तावस्था में अहं का सेंसर थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसलिए फ्रायड ने स्वप्न के स्वरूप
को इच्छापूर्ति करने वाला कहा है। अपनी पुस्तक ‘The interpretation of
dreams’ (1955) में डॉ. सिग्मंड फ्रायड ने
स्वप्न के विषय में कहा है कि "मन की अचेतन गतिविधियों के ज्ञान के लिए सपनों
की व्याख्या शाही मार्ग है”।[3]
इस विधि में परामर्शदाता रोगी से अपने
दैनिक प्रश्नों को सच-सच बताने को कहता है। परामर्शदाता उन सपनों को नोट करता जाता
है। फिर वह इनका विश्लेषण करता है। विश्लेषण में वह व्यक्त और अव्यक्त स्वप्नों
में छुपे अर्थों को समझकर रोगी का निदान करता है। फ्रायड ने स्वप्नों के विश्लेषण
और अध्ययन में मनुष्य की स्वप्न निर्माण की कला के बारे में जाना। इसके विषय में लेखक
लालजी राम शुक्ल (1947) ने अपनी पुस्तक मानसिक चिकित्सा में ने लिखा
है कि "जो मनुष्य आत्म-स्वीकृति से जितना ही अधिक भागता है उसके स्वप्न उतने
ही अधिक अस्पष्ट होते हैं। जब मनुष्य रोग से तंग होकर अपने अभिमान को खो देता है
और आत्म-स्वीकृति करने के लिए तत्पर होता है तब उसके स्वप्न भी स्पष्ट हो जाते हैं”।[4] स्वप्न
निर्माण में मनुष्य का अचेतन मन विशेष प्रकार की
रचनाओं या कलाओं से काम लेता है। फ्रायड के अनुसार ये निम्नलिखित पाँच
प्रकार की होती हैं – संक्षेपण (Condensation),
विस्थापन (Displacement), प्रतीकीकरण (Symbolization),
नाट्कीयकरण (Dramatization), गौण विस्तारण
(Secondary Elaboration)
कभी-कभी
स्वप्न का विचार बहुत बड़ा होता है। हमारे मन की एक सामान्य भावना भी एक लम्बे
स्वप्न में प्रदर्शित होती है। कभी ऐसा होता है कि हम स्वप्न में अपने मनोभावों को
किन्हीं दूसरों पर आरोपित करते हैं। कभी स्वप्न किसी कथानक या नाटक के रूप में हम
देखते हैं और उसमें स्वयं को नायक या पीड़ित की भूमिका में पाते हैं। जैसे फ्रायड
ने स्वप्नों के संकेतों का स्पष्टीकरण में कुछ उदाहरण दिए,
स्वप्न में देखे खम्भे, बच्चे और सांप
जननेन्द्रिय के बोधक हैं। हवा में उड़ना, पानी में तैरना,
सीढ़ी चढ़ना इत्यादि रति क्रिया के बोधक हैं।
5.6.3
अंतरण विश्लेषण (Analysis of Transference)
स्थानांतरण,
जिसे पहले सिगमंड फ्रायड द्वारा वर्णित किया गया था, मनोचिकित्सा में एक घटना है जिसमें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में
भावनाओं का अचेतन पुनर्निर्देशन होता है। स्थानांतरण को, सामान्य
तौर पर, "किसी चीज़ या किसी व्यक्ति को एक स्थान,
स्थिति, आदि से दूसरे स्थान पर ले जाने की
प्रक्रिया" के रूप में परिभाषित किया गया है। अंतरण में परामर्शी का
परामर्शकर्ता के प्रति धनात्मक प्रतिक्रिया रहती है। वह परामर्शकर्ता पर विश्वास
करता है तथा उसे अपने भूतकालीन जीवन के महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखता है।
वह उसे अपना अभिभावक समझकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है। स्थानांतरित भावनाओं
के माध्यम से कार्य करना मनोगतिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानांतरण
की प्रकृति परामर्शी के मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण सुराग प्रदान कर सकती है,
प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से परामर्शकर्ता को उनके मानस में गहरे
संघर्षों को हल करने में मदद मिल सकती है। अपने बाद के लेखन में, फ्रायड ने सीखा कि स्थानांतरण को समझना मनोचिकित्सात्मक कार्य का एक
महत्वपूर्ण हिस्सा था। 1912 के "द डायनेमिक्स ऑफ
ट्रांसफरेंस" नामक एक लेख में, फ्रायड ने यह स्पष्ट किया था कि “स्थानांतरण एक
अपरिहार्य प्रक्रिया है: "मैं यह जोड़ना चाहता हूं कि विश्लेषण के दौरान
स्थानांतरण अनिवार्य रूप से उत्पन्न होता है और उपचार में अपनी प्रसिद्ध भूमिका
निभाने के लिए आता है”।[5]
चिकित्सा
में तीन प्रकार के स्थानांतरण होते हैं -
Ø सकारात्मक
स्थानांतरण
Ø नकारात्मक
स्थानांतरण
Ø यौन
अंतरण
सकारात्मक स्थानांतरण
का एक उदाहरण है कि स्थानांतरण कभी-कभी एक अच्छी बात हो सकती है। जब आप अपने
परामर्शदाता के साथ संबंधों के लिए अपने पिछले संबंधों के सुखद पहलुओं को लागू
करते हैं। इसका सकारात्मक परिणाम हो सकता है क्योंकि आप अपने परामर्शदाता को को
देखभाल करने वाले, बुद्धिमान और आपके
बारे में चिंतित के रूप में देखते हैं। Autism and Transference: Case
Study in a Brazilian Primary School में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे से
जुड़े केस स्टडी में सकारात्मक स्थानांतरण के लाभों को देखा जा सकता है। एक बार सकारात्मक स्थानांतरण होने के बाद, परामर्शदाता
के साथ युवा लड़के का बंधन मजबूत होने लगा और उसने उसके निर्देशों का पालन करना
शुरू कर दिया, अपने आक्रामक व्यवहार को कम कर दिया, और उसकी सीखने की क्षमता विकसित हुई।[6]
नकारात्मक स्थानांतरण
में परामर्शदाता को नकारात्मक भावनाओं का स्थानांतरण शामिल है। क्रोध और शत्रुता
दो भावनाएँ हैं माता-पिता या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति के प्रति बचपन में महसूस की
जा सकती हैं और यही भावनाएँ परामर्शग्राही द्वारा परामर्शकर्ता के प्रति व्यक्त हो
सकती हैं। नकारात्मक संक्रमण बुरा लगता है लेकिन वास्तव में चिकित्सीय अनुभव को
बढ़ा सकता है। एक बार एहसास हो जाने पर, परामर्शकर्ता इस स्थानांतरण को चर्चा के विषय के रूप में
उपयोग करने में सक्षम होता है, और रोगी की भावनात्मक
प्रतिक्रिया की जांच करता है। यौन अंतरण, कभी-कभी
ऐसा पाया गया है कि परामर्शी अपनी भावनाओं के व्यक्तीकरण में परामर्शदाता से इतना निकट
आ जाता है कि वह उसके प्रति आकर्षण महसूस करने लगता है। इस प्रकार के आकर्षण में
रोमांटिक या कामुक, श्रद्धा या पूजा की भावना तथा अंतरंग और
यौन की भावना छुपी होती है। Erotic Transference in Therapy with a
Lesbian Client (2015) शोध से पता चलता है कि एलजीबीटीक्यू
समुदाय के सदस्यों के लिए यौन अंतरण अधिक आम हो सकता है, खासकर
अगर उस व्यक्ति के कुछ दोस्त या अन्य लोग हैं जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं या
भरोसा कर सकते हैं।[7]
5.6.4
अवरोध विश्लेषण (Analysis of Resistance)
देखा गया है परामर्शकर्ता को परामर्शी
में आरम्भ में बड़ा सुधार दिखाई पड़ता है लेकिन बाद में गति अत्यधिक धीमी हो जाती
है। यही अवरोध कहलाता है इसको परामर्शी के निम्न व्यवहार जैसे देर से आना,
नहीं आना, अनुभवों के प्रकटीकरण में आनाकानी
करना तथा विचारों को रोकना। जैसे ही अवरोध दिखे परामर्शकर्ता को तुरंत इसके उपाय
में जुट जाना चाहिए। अवरोध विश्लेषण इसका उचित उपाय है।
फ्रायड
ने 1949 में प्रकाशित पुस्तक ऍन आउटलाइन ऑफ़
साइकोएनालिसिस के छठवें अध्याय में इसके विषय में लिखा है कि “यह स्पष्ट हो गया कि जो कुछ रोगजनक रूप से भुला दिया गया था उसे उजागर
करने के कार्य को निरंतर और बहुत तीव्र प्रतिरोध के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा। रोगी
ने आलोचनात्मक आपत्तियां इसलिए उठाईं, ताकि वह उन विचारों को
संप्रेषित करने से बच सके जो उसके साथ घटित हुए थे, और जिसके
विरुद्ध मनोविश्लेषण के मूल नियम को निर्देशित किया गया था, वे
स्वयं पहले से ही इस प्रतिरोध की अभिव्यक्तियाँ थे। प्रतिरोध की घटना पर विचार
करने से न्यूरोसिस के मनो-विश्लेषणात्मक सिद्धांत के कोने-पत्थरों में से एक - दमन
का सिद्धांत सामने आया। यह मान लेना प्रशंसनीय था कि वही ताकतें जो अब सचेत किए जा
रहे रोगजनक पदार्थ के खिलाफ संघर्ष कर रही थीं, उन्होंने
पहले के समय में सफलता के साथ वही प्रयास किए थे”।[8]
5.6.5
स्पष्टीकरण (Interpretation)
स्पष्टीकरण
प्रक्रम का अर्थ है परामर्शदाता को परामर्शग्राही की सोच,
विचार, भावनाओं, तथ्यों
को सही प्रकार से समझकर उनका विश्लेषण करना। इसके माध्यम से परामर्शदाता
परामर्शग्राही को उसके भूत व वर्तमान निजी अनुभवों को स्वयं समझने तथा उनसे अनुकूल
होने में मदद करता है। उसे स्पष्टीकरण का प्रयोग बहुत समझदारी से करना करना चाहिए।
अगर वह प्रारम्भ में ही इस प्रक्रम का उपयोग करेगा तो परामर्श लेने वाला दूर हो
जायेगा और अंत तक नहीं करेगा तो परामर्श लेने वाला अंतर्ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो
पायेगा। इसलिए इसका प्रयोग तब करें जब परामर्शग्राही के वृद्धि और विकास पर कोई
प्रभाव या अवरोध ने पड़े।
उपरोक्त
व्यक्तित्व विश्लेषण की प्रविधियाँ दमित
इच्छाओं से उलझे अंतःकरण को सुलझाने तथा मनुष्य को जीवन के आंतरिक उद्वेगों से
मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होती हैं। व्यक्ति के रोग और जीवन का असंतुलन
शारीरिक रोगों से इतना नहीं होता है जितना कि मनोरोगों से होता है। इन मानसिक
गुत्थियों का सम्बन्ध उसके वर्तमान जीवन से ही नहीं वरन बीते हुए जीवन (जिसमें
उसका बाल्यकाल भी सम्मिलित है) होता है। इतनी गहन गुत्थियों को सुलझाने के लिए इन
विधियों की सहायता से गहरा उतरा जाता है।
[1] American
Psychiatric Association
https://www.psychiatry.org/patients-families/psychotherapy
[2] Novac,
Andrei & Blinder, Barton J. (2021) Free association in psychoanalysis,
London: Neuropsychoanalysis An Interdisciplinary Journal for Psychoanalysis and
the Neurosciences, p. 55
[3] Freud,
Sigmund (1955) The Interpretation of Dreams, New York: Basic Book Publication,
p. 586
[4] शुक्ल, लालजी राम (1947) मानसिक
चिकित्सा, बनारस : नंदकिशोर एंड
ब्रदर्स, पृ० - 127
[5]
Freud, Sigmund (1912) The Dynamics of the Transference, unpublished, p.313
[6]
Geraldo A. Fiamenghi Jr (2019) EAS Journal of Psychology and Behavioural
Sciences, Kenya: East African Scholars Publisher, p. 84-89
[7] Devi KD,
Manjula M, Math SB (2015) Erotic Transference in Therapy with a Lesbian
Client., Bangalore: Ann Psychiatry Mental Health, p. 1029
[8] Freud,
Sigmund (1949) An Outline of Psychoanalysis, New York: W. W. Norton, p. 57
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