मनुष्य जीवन का संतुलित होना अतिआवश्यक है। संतुलित व्यक्तित्व का मनुष्य ही स्वयं से, परिवार से तथा समाज से उचित सामंजस्य बिठा पाता है। व्यक्तित्व असंतुलित हो जाने पर व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है जिससे, जहाँ एक ओर उसके परिवारजन परेशान और चिंतित हो जाते हैं वहीँ दूसरी ओर समाज के लोग उससे बचते-बचते दिखाई देते हैं। फ्रायड ने पहले ही मन के तीन स्तर चेतन, पूर्वचेतन और अचेतन के अध्ययन में व्यक्ति के असंतुलन का रहस्य उद्घाटित किया। उसी कड़ी में फ्रायड ने आगे बताया कि व्यक्ति के व्यवहार, व्यक्तित्व के तीन महत्वपूर्ण उपतंत्रों की पारस्परिक अंतःक्रिया के परिणाम होते हैं। फ्रायड ने इनको उपाहं या इड (Id), अहं (Ego) तथा पराहं (Super Ego) के नाम से पुकारा है। इनमें इड, जो हमारे मन के अचेतन भाग में निवास करता है, ईगो, जो मुख्य रूप से मन के अचेतन और चेतन भागों में रहता है, और सुपर ईगो, जो तीनों भागों में रहता है। इन्हें फ्रायड ने व्यक्तित्व के संरचनात्मक मॉडल के अंतर्गत रखा है। फ्रायड के अनुसार “संरचनात्मक मॉडल से तात्पर्य उन साधनों या प्रतिनिधियों से होता है जिनके द्वारा मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले मानसिक संघर्षों का समाधान होता है”।[1] ऐसे साधन या प्रतिनिधि तीन हैं - उपाहं या इड (Id), अहं (Ego) तथा पराहं (Super Ego)
5.5.1
उपाहं या इड (Id)
आंतरिक प्रेरणाओं और मानसिक शक्ति के
स्रोत्र को फ्रायड ने इड का नाम दिया है। यह व्यक्ति का जैविक तत्व होता है। इसमें
ऐसी प्रवृतियों की अधिकता होती है जो जन्मजात होती हैं तथा असंगठित,
कामुक, आक्रामकतापूर्ण तथा किसी नियम को न
मानने वाली होती हैं। इड अपनी इच्छाओं की जल्द से जल्द पूर्ति चाहता है चाहे उसके
परिणाम जो भी हों, यह चिंता वह नहीं करता। इसे फ्रायड ने सुख
के सिद्धांत (pleasure principle) की संज्ञा दी
है। इड की प्रवृत्तियों का प्रमुख उद्देश्य सुख देने वाली प्रेरणाओं की संतुष्टि
होता है। इसे उचित-अनुचित, विवेक-अविवेक, समय, स्थान आदि से कोई लेना-देना नहीं होता है। उदाहरण
के रूप में कई बार केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी यह ख़बरें हमारे सामने आई
हैं कि अमुख देश के सांसद या अमुख कंपनी के अधिकारी सत्र या मीटिंग के दौरान अपने
मोबाइल फ़ोन पर अश्लील वीडियो देखते पाए गए और इसके लिए उन्हें समाज में भरी
शर्मिंदगी और आलोचना झेलनी पड़ी।[2]
बस इड मान-सम्मान, नीति-अनीति,
यश-अपयश इन किसी की परवाह न करके तात्कालिक सुख के लिए लालायित रहता
है। ऐसा इसलिए होता क्योंकि इड बाहरी जगत की वास्तविकता के विषय में पूर्णरूपेण
अनभिज्ञ है। ईगो अनेक बार इसके सामने बाहरी दुनिया का अक्स फेंकता है लेकिन इसमें
देखने की शक्ति नहीं होती है और ऊपर से यह जंगली, हठी तथा
असामाजिक प्रकृति का है।
मनोविश्लेषण और उसके जन्मदाता
(1950)
पुस्तिका की लेखिका इड की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए लिखती
हैं कि "इसके लिए बीस वर्ष पूर्व और आज हुई घटनाओं में कोई भेद नहीं है। हो सकता
है, बीस वर्ष पूर्व हुई घटना इसमें बड़ी स्वछंदता से अंकित
पड़ी हो। इसकी कल्पनाओं पर सोचने के नियम लागू नहीं होते और न ये प्रतिकूलता के
नियम (Law of opposites) से परिचित है। इसके लिए
के व्यक्ति घृणा और प्रेम दोनों का पात्र हो सकता है। यह क्रूर,अंधी, गतिपूर्ण और दमन की हुई प्रज्जवलित वासनाओं
के धधकते हुए वायलर के समान है। अहंभाव द्वारा दमन की गई हर प्रकार की इच्छाएँ
तथा अनुभूतियाँ इसी में आकर केन्द्रीभूत होती हैं और इसका सर्वोत्तम नियम उनकी
तुष्टि है”।[3]
चूँकि समाजिक और सांस्कृतिक नियमों को
दृष्टिगत रखते हुए इड की इच्छाओं की तत्काल तुष्टि संभव नहीं होती इसलिए व्यक्ति
में उत्पन्न तनावों एवं संघर्षों को दूर करने के लिए यह दो प्रकार के प्रक्रमों
(mechanisms)
को अपनाता है –
Ø प्रतिवर्त
प्रक्रिया (reflex action) -
इस प्रक्रिया में व्यक्ति में तनाव उत्पन्न करने वाले स्रोत्र के
प्रति इड स्वतः अनुक्रिया करके तनाव को दूर करता है। जैसे खाँसना, छींकना, आँख मटकाना आदि इसके उदाहरण हैं।
Ø प्राथमिक
प्रक्रिया (primary process) -
इसमें व्यक्ति तनाव दूर करने के लिए उस वस्तु या व्यक्ति की एक
मानसिक प्रतिमा बना लेता है जिसका सम्बन्ध पहले मूल प्रणोदों (drives) की तुष्टि से था। जैसे बच्चा अमुक खिलौना जिससे पहले खेलता था, नहीं देने पर उस खिलौने की कल्पना मात्र से ही अपनी इच्छा पूर्ण कर लेता
है। शिशु प्राथमिक प्रक्रिया के सहारे ही अपना तनाव दूर करता है।
इड मनुष्य के भीतर विद्यमान पशु के
समान है। जैसे मनुष्य में पशु प्रवृत्तियाँ छुपकर रहती हैं वैसे यह भी अचेतन में
छुपा रहता है। कहा जा सकता है कि पशु वृत्तियाँ तथा यह एक सिक्के के दो पहलू हैं।
इड
की कुछ अन्य विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है –
Ø इड
में जीवन मूलप्रवृत्तियों तथा मृत्यु मूल प्रवृत्तियों दोनों का ही समावेश रहता
है। जीवन मूलप्रवृत्ति के कारण व्यक्ति
रचनात्मक कार्य तथा मृत्यु मूल प्रवृत्ति के कारण ध्वंसात्मक कार्य करता है।
उदाहरण के लिए एक बच्चा अपने खिलौने से आनंदपूर्वक खेलता है और बाद में उसे पटककर
तोड़ भी देता है।
Ø इड
का सम्बन्ध जीवन की वास्तविकताओं से नहीं होता है।
वह अपनी सभी इच्छाओं की तत्काल पूर्ति के लिए लालायित रहता है। वास्तविकताओं से
परे होने के कारण ही यह व्यक्तियों के जीवन के अनुभवों में परिवर्तित नहीं होता
है।
Ø इड
सुख के सिद्धांत द्वारा निर्देशित होता है।
जिसका एक ही नियम (if it feels good, do it) है। जैसा की फीस्ट ने कहा है कि “इड की सब शक्ति एक उद्देश्य के लिए व्यय की जाती है और वह है सुख या आनंद
प्राप्त करने का उद्देश्य”।[4]
Ø इड
पूर्णतः अचेतन होता है। इसकी प्रवृतियाँ अचेतन रूप से अपनी संतुष्टि चाहती हैं और
ये नैतिकता से परे, असामाजिक तथा
अतार्किक होता है। यह शीघ्र-अतिशीघ्र किसी भी कीमत पर अपनी इच्छाओं की
तृप्ति-तुष्टि चाहता है।
ध्यान
देने वाली बात यह है कि मनुष्य का अचेतन तीन प्रतिस्पर्धी शक्तियों अथवा ऊर्जाओं
से निर्मित हुआ है। इड, ईगो और सुपर ईगो का
सापेक्ष संतुलन प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व की स्थिरता का निर्धारण करता है।
कुछ लोगों में इड, सुपर ईगो से प्रबल होता है तथा कुछ लोगों
में सुपर ईगो, इड से प्रबल होती है।
5.5.2
अहं या ईगो (Ego)
अहं चेतन व्यक्तित्व का एकमात्र अंग
है। यह ही व्यक्तित्व के निर्णय लेने वाला घटक होता है। यही व्यक्ति के व्यक्तित्व
को दूसरों के सामने पेश करने का काम करता है। यह इड जो अराजक अनियंत्रित और अनैतिक
है और सुपर ईगो जो नैतिक, सामाजिक और
सांस्कृतिक है के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है। यह मन का वह भाग है जो वास्तविकता
से सम्बंधित होता है। चूँकि अहं अंशतः (partly) चेतन,
अंशतः पूर्वचेतन और अंशतः अचेतन होता है, इसलिए
तीनों स्तर पर निर्णय इसके द्वारा लिया जाता है। अहं, इड की मांगों को पूरा करने के यथार्थवादी
तरीकों पर काम करता है, अक्सर समाज के नकारात्मक परिणामों से
बचने के लिए इड की संतुष्टि से समझौता या स्थगित कर देता है। अहं व्यवहार करने का
तरीका तय करने में सामाजिक वास्तविकताओं और मानदंडों, शिष्टाचार
और नियमों पर विचार करता है। फ्रायड (1923) के
अनुसार "अहंकार, इड का वह हिस्सा है जिसे बाहरी दुनिया
के प्रत्यक्ष प्रभाव से संशोधित किया गया है।"[5] बैरन (2001) के अनुसार "व्यक्तित्व का वह
पक्ष जो मूल प्रवृत्तियात्मक, लैंगिक तथा आक्रामक इच्छाओं की
पूर्ति के लिए बाह्य जगत की वास्तविकताओं पर ध्यान देता है”।[6] विटेन (1995) ने अहं को परिभाषित करते हुए कहा
है कि "यह व्यक्तित्व का निर्णय लेने वाला घटक है, जिसका
कार्य वास्तविकता के सिद्धांत के आधार पर क्रियान्वयित होता है”।[7]
व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा अन्य संज्ञानात्मक (cosnitive)
एवं बौद्धिक (intellectual) कार्यों को करने
में अहं त्रिकोणी संघर्ष से घिर जाता है। अहं इन कार्यों को करने में इड, सुपर ईगो तथा वास्तविक दुनिया की मांगों को ध्यान में रखता है। इड तथा
सुपर ईगो की माँगे अवास्तविक होती हैं। दूसरी ओर बाह्य दुनिया की मॉंग वास्तविक
एवं सामाजिक नियमों के अनुकूल होती हैं। यहाँ अहं, त्रि -
द्वन्द का सामना करता है। अगर वह इड और सुपर ईगो की माँग
के अनुसार निर्णय लेगा तो वास्तविक दुनिया की अवहेलना होगी। अगर वह वास्तविक दुनिया
के अनुसार निर्णय लेगा तो इड तथा सुपर ईगो की अवहेलना होगी। अतः उसे इस तरह का
निर्णय करना होता है जिससे इड तथा सुपर ईगो दोनों को संतुष्टि मिले तथा वास्तविक
दुनिया से संगति भी बनी रहे।
व्यक्तित्व
के कार्यकारिणी शाखा (executive branch) के
रूप में अहं संघर्षमय परिस्थिति से उत्पन्न चिंता को कम करने के लिए बचाव
प्रक्रम (defense mechanism) का सहारा लेता है।
फ्रायड ने अहं की कुछ निम्नलिखित
विशेषताएँ बताई हैं –
Ø अहं
तीनों स्तर चेतन, पूवचेतन और अचेतन में
विद्यमान रहता है तथा इसके द्वारा
तीनों स्तरों पर निर्णय लिया जाता है। फीस्ट ने कहा है कि "चूँकि अहं अंशतः
चेतन,
अंशतः पूर्वचेतन तथा अंशतः अचेतन होता है, अतः
तीनों स्तरों में निर्णय लेने का कार्य यही करता है”।[8]
Ø अहं
को व्यक्तिगत निर्णय लेने वाली या कार्यकारिणी
शाखा (executive branch)
के रूप में कार्य करता है। अतः इसके द्वारा ही सभी महत्वपूर्ण
निर्णय लिए जाते हैं।
Ø अहं
वास्तविकता के सिद्धांत पर आधारित होता है
इसलिए इड और सुपर ईगो से भिन्न होता है क्योंकि इन दोनों का वास्तविकता से कोई
लेना-देना नहीं होता है।
Ø अहं
का सम्बन्ध नैतिकता से नहीं होता। अहं का काम यह
देखना नहीं है कि क्या उचित है या क्या अनुचित। वह यह देखता है कि किसी कार्य को
करने का यह सुअवसर है या सुअवसर नहीं है। अगर सुअवसर मिले तो यह अनुचित कार्य की
भी अनुमति दे देता है।
Ø अहं
एक समायोजक तथा संतुलनकर्ता के रूप में कार्य करता है।
वह एक ओर जहाँ इड तथा सुपर ईगो की अवास्तविक प्रवृत्तियों से पूर्णतः अवगत रहता है
और उनके परिणाम भी गम्भीरतापूर्वक जाँचता है। वहीँ दूसरी ओर इन दोनों की उन
प्रवृत्तियों एवं इच्छाओं की सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर अवसर मिलने
पर पूर्ति की अनुमति देता है।
अहं और इड के पारस्परिक सम्बन्ध की के
बारे में फ्रायड ने बताया है कि इनके बीच में घोड़े और घोड़े पर सवार एक ऐसे घुड़सवार
का सम्बन्ध होता है, जिसे अपने आप से
बलवान घोड़े को वश में करना हो। इस प्रक्रिया में घोड़ा इड तथा घुड़सवार अहं है।
इसमें मुख्य बात यह है कि अहं के पास अपना बल नहीं होता उसे इड रूपी घोड़े को वश
में करने के लिए बल भी उससे ही उधार लेना पड़ता है। ये कहा जा सकता है कि अहं,
इड का ही एक भाग जो बाहरी दुनिया की वास्तविकता से प्रभावित हो बदल
गया है।
5.5.3
पराहं या सुपर ईगो (Super Ego)
सुपर ईगो अचेतन का एक हिस्सा है जो
अंतरात्मा की आवाज (जो सही है उसे करना) और आत्म-आलोचना का स्रोत है। यह नैतिक
मूल्यों तथा आदर्शों को दर्शाता है। इसे व्यक्तित्व का नैतिक कमांडर भी कहा जाता
है। जैसे इड का सम्बन्ध अनैतिकता से होता है तथा वह उसकी तृप्ति के लिए वास्तविकता
की परवाह नहीं करता, ठीक उसके विपरीत
लेकिन सामानांतर सुपर ईगो का सम्बन्ध परम नैतिकता से होता है और यह भी उसकी पूर्ति
के लिए वास्तविकता की परवाह नहीं करता। उदाहरण स्वरूप जहाँ डाकू अंगुलिमाल अपने
अचेतन की कुत्सित इच्छा की पूर्ति के लिए हत्या पर हत्या किये जाता है और समाज की
वास्तविकता की परवाह नहीं करता ठीक उसके विपरीत गौतम बुद्ध अपने राजपाट, सुख-वैभव को छोड़कर जवानी में ही सन्यास की ओर बढ़े चले जाते है और समाज की
वास्तविकता की परवाह नहीं करते। सुपर ईगो व्यक्तित्व में जिस पूर्णता की बात करता
है वह जगत में अवास्तविक ही होती है। बैरन (2001) के शब्दों में "नैतिक मन व्यक्ति के व्यक्तित्व का वह घटक है,
जो अंतःकरण का प्रतिनिधित्व करता है”।[9]
उपरोक्त परिभाषा के आधार पर हम कह
सकते हैं कि सुपर ईगो, अंतरात्मा या हमारी 'आंतरिक आवाज' है जो हमें बताती है कि हमने कब
कुछ गलत किया है। उदाहरण के लिए, यदि अहं, इड की मांगों को स्वीकार करता है, तो यह व्यक्ति को
अपराध बोध के माध्यम से बुरा महसूस करा सकता है। विटेन (1995)
के अनुसार "सुपर ईगो व्यक्ति के व्यक्तित्व का नैतिक घटक है,
इसमें सही-गलत तथा करणीय-अकरणीय का निर्धारण करने वाले सामाजिक मानक
समाहित होते हैं”।[10] यह कहा जा सकता है कि बचपन में समाजीकरण के दौरान बच्चा माता-पिता,
शिक्षकों आदि के द्वारा दिए गए उपदेशों को अपने अहं में आत्मसात कर
लेता है और बाद में यही सुपर ईगो का रूप ले लेता है।
फ्रायड
(1923)
ने सुपर ईगो की उत्पत्ति पर विचार करते हुए बताया है कि "यदि
हम एक बार फिर सुपर ईगो की उत्पत्ति के रूप में विचार करें तो हम यह स्वीकार
करेंगे कि यह दो अत्यधिक महत्वपूर्ण कारकों का परिणाम है, एक
जैविक और एक ऐतिहासिक प्रकृति। वह आगे बताते हैं कि जब हम छोटे थे तो अपने
माता-पिता की नैतिकता और उच्च मूल्यों को पसंद करते थे और डरते थे कि कहीं हम
उन्हें पालन करने में चूक न जाएँ और शनैः शनैः हम उन्हें अपने भीतर ले ही आते थे”।[11]
फ्रायड ने सुपर ईगो के दो उपतंत्र
बतलायें हैं - अंतःकरण (conscience)
तथा अहं आदर्श (ego ideal)।
हालाँकि फ्रायड ने दोनों के बीच ज्यादा अंतर तो नहीं बताया लेकिन उपरोक्त वक्तव्य
से इतना तो उद्घाटित होता है कि जब बच्चों को गलती करने पर दंड मिलता है तो इससे
उनमें अंतःकरण विकसित होता है तथा जब उन्हें कोई उत्तम व्यवहार करने पर पुरस्कार
मिलता है तो इससे उनमें अहं आदर्श विकसित होता है। सुपर ईगो विकसित होकर एक ओर
जहाँ इड की कामुक, आक्रामक एवं अनैतिक प्रवृत्तियों पर रोक
लगाने का काम करता है वहीँ दूसरी ओर अहं को वास्तविक तथा यथार्थ लक्ष्यों से हटाकर
नैतिक लक्ष्यों की ओर ले जाता है। इससे व्यक्ति के व्यक्तित्व में घटित यह होता है
कि व्यक्ति सुपर ईगो को पूर्णतः विकसित करने के लिए इड की कामुक और आक्रामक
प्रवृत्तियों पर नियंत्रण के लिए दमन (repression) का प्रयोग करता है। हालाँकि व्यक्ति का सुपर ईगो दमन का प्रयोग नहीं करता
बल्कि उसके अहं को आदेश देकर यह कराया जाता है। सुपर ईगो इसका ध्यान नहीं रखता कि
अहं को उसके आदेश के पालन में वास्तविक रूप से कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा
है। सुपर ईगो आँख मूंदकर अपने नैतिक लक्ष्य की ओर अहं को खींचने का प्रयास करता
है। सुपर ईगो अहं से दूर खड़े होकर अहं पर ही शासन करता है।
इसी
बात की व्याख्या करते हुए अर्नेस्ट जोंस (1953) सिग्मंड फ्रायड की जीवनी 'दी लाइफ एंड वर्क ऑफ़ सिग्मंड फ्रायड'
में लिखते हैं कि "सुपर ईगो एक प्रकार से अहं की शैशवकालीन
क्षीणता और आश्रय लालसा का स्मारक है जिसका प्रभाव अहं के सुदृढ़ हो जाने पर भी
कायम रहता है। जिस प्रकार बाल्यकाल में, बालक अपने माँ-बाप
की आज्ञा का पालन करता था उसी प्रकार बाद में अहं, सुपर ईगो
के आदेश को स्वीकार करता है। सुपर ईगो भी उसी प्रकार व्यक्ति की रक्षा और आश्रय
लालसा पूरी करता है जिस प्रकार एक माता-पिता और फिर विधि तथा भाग्य करते हैं”।[12]
सुपर ईगो के बारें में निम्नलिखित विशेषताएँ पाई
जाती हैं –
Ø सुपर
ईगो व्यक्तित्व का नैतिक कमांडर होता है यह आदर्शों से भरा होता है। इसके प्रभाव
से इड की कामुक प्रवृत्तियों पर अहं नियंत्रण रख पाता है।
Ø सुपर
ईगो अवास्तविक होता है। इड की तरह सुपर ईगो भी वास्तविकता से परे होता है। यह अहं
पर अपने निर्देशों का पालन करने का दबाव डालता है और अहं को उनके पालन में आने
वाली वास्तविक कठिनाइयों का जरा भी ध्यान नहीं रखता।
Ø सुपर
ईगो भी इड तथा अहं के समान काल्पनिक भाग है जिसे ठोस रूप में दिखाया नहीं जा सकता
है।
Ø सुपर
ईगो व्यक्ति की कामुक तथा अनैतिक प्रवृत्तियों पर रोक दमन के माध्यम से अहं द्वारा
लगवाता है।
अंत में फ्रायड ने यह स्पष्ट कर दिया
कि व्यक्तित्व के तीनों उपतंत्र इड, अहं
तथा सुपर ईगो के बीच कोई तीखा अंतर नहीं होता है। इन तीनों शक्तियों का विकास
विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न स्वरूप में होता है। एक स्वस्थ सामान्य
व्यक्ति में सुपर ईगो, अहं तथा इड काफी समन्वित रूप में
कार्य करते हैं तथा इनमें किसी प्रकार का संघर्ष नहीं होता। ऐसे व्यक्ति का अहं
काफी शक्तिशाली होता है तथा वह एक संतुलित व्यक्तित्व का धारक होता है।
[1] सिंह, अरुण कुमार (2003) उच्चतर
सामान्य मनोविज्ञान, दिल्ली : मोतीलाल
बनारसीदास प्रेस, पृ० - 958
[2]
https://www.firstpost.com/world/not-suitable-for-work-the-times-when-politicians-saw-pornography-rather-than-doing-their-jobs-10625081.html
[3] गार्गी, संतोष और गार्गी, परितोष
(1951), मनोविश्लेषण और उसके जन्मदाता, नई दिल्ली : प्रोग्रेसिव पब्लिशर्स, पृ० - 68
[4] Fiest,
Gregory J. (2008) Theories of Personality, New York: McGraw-Hill company, p. 27
[5] Freud,
Sigmund (1923) The Ego and the Id, Delhi: General Press, p. 25
[6] Baron,
Robert A. (2001) Social Psychology, New York: Pearson Publication, p. 153
[7] Weiten,
Wayne (1995) Psychology Applied to Modern Life, Belmont CA: Wadsworth
Publishing Co, p. 323
[8] Fiest, Gregory J. (2008) Theories of
Personality, New York: McGraw-Hill company, p. 29
[9] Baron,
Robert A. (2001) Social Psychology, New York, Pearson Publication, p. 156
[10] Weiten,
Wayne (1995) Psychology Applied to Modern Life, Belmont CA: Wadsworth
Publishing Co, p. 328
[11] Freud,
Sigmund (1923) The Ego and the Id, Delhi: General Press, p. 32
[12]
Jones, Ernest (1953) The Life and Work of Sigmund Freud, New York: Basic Books,
p. 233