Saturday, October 7, 2023

फ्रायड के मनोवैज्ञानिक विचारों का विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में अध्ययन ( Stage of Personality Development)


विद्यार्थी जीवन ही मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला है। वैश्विक स्तर पर बालक के आधिकारिक रूप से विद्यार्थी कहलाने की आयु भिन्न-भिन्न देशों के विद्वान् भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित करते हैं। कई तो केवल उस बालक को ही विद्यार्थी मानते हैं जो आधिकारिक रूप से किसी शिक्षण संस्थान में अध्ययनरत हो। भारत में प्राचीन काल से ही यह कथन गाँव-गाँव तथा नगर-नगर प्रचलित कि बालक की प्रथम प्रशिक्षक उसकी माँ होती है तथा उसका प्रशिक्षण माँ के गर्भ से ही आरम्भ हो जाता है।

बच्चे माता-पिता के लिए भगवान् का उपहार होते हैं तथा उन्हें पाकर माता-पिता भी आनंदित होते हैं। परन्तु माता-पिता संतान प्रेम में जितना भावुक होते हैं उतना ही अनभिज्ञ उनके लालन-पालन में होते हैं। समाज में प्रचलित मानकों को आधार मानकर वह बालक का लालन-पालन करना चाहते हैं और साथ ही में अपने पूर्वाग्रह संतान के जीवन का उपयोग कर पूरा करना चाहते हैं। माता या पिता जो भी इच्छाएँ या आकांक्षाएँ अपने जीवन में पूर्ण करने में असफल रहते हैं, यह देखा गया है उनको वह अपने बच्चे के माध्यम से पूर्ण होते हुए देखना चाहते हैं। इसमें सबसे बड़ी गलती यह होती है कि माता-पिता बच्चे को अपनी संपत्ति समझ लेते हैं। उन्हें यह अंदाजा ही नहीं होता कि बच्चा एक अलग व्यक्तित्व है। अनुचित चाह, माँ-बाप की यह स्वार्थ पूर्ण लालसा बच्चों के जीवन-विकास में सबसे अधिक बाधाएँ उपस्थित करती है।

प्रत्येक बालक अपने जीवन में कुछ मूल प्रवृत्तियाँ लेकर आता है। वंश परम्परा के कुछ संस्कार तथा मूल प्रवृत्तियाँ लेकर वह जगत में प्रवेश करता है। इन मूल प्रवृत्तियों तथा वातावरण की पारस्परिकता से ही उसके चरित्र का निर्माण होता है। बच्चे के निर्माण में माता-पिता तथा शिक्षक को सतर्कता, धैर्य तथा सुयोग्यता का परिचय देना चाहिए। यह बहुत ही कठिन लेकिन आवश्यक कार्य है जिसे हर कीमत पर उचित ढंग से पूर्ण किया जाना है। अगर इसे सही ढंग से न किया जाये तो समाज  एक सभ्य और सुशील नागरिक की संभावना तो खो ही देता देता है, साथ ही एक असभ्य तथा अराजक व्यक्तित्व की संख्या बढ़ा लेता है।

जेन मिलर (2009) अपने लेख में बताते हैं कि  "सिग्मंड फ्रायड ने भी घोषणा करते हुए कहा है कि तीन असंभव पेशे हैं-शिक्षित करना, उपचार करना, शासन करना[1] यह कार्य मुश्किल और दीर्घकालीन भले ही हो लेकिन आवश्यक है इसलिए इसे उचित ढंग से किया जाना चाहिए तथा डॉ सिग्मंड फ्रायड का मनोविश्लेषण सिद्धान्त विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के गठन करने तथा उनकी गुत्थियों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन कर सकता है। माता-पिता तथा शिक्षक इसका अध्ययन करें तथा इसे समझे तो बालक के निर्माण में समय-समय पर उन्हें उसकी गुत्थियों, कुंठाओं तथा मानसिक समस्यायों को हल करने में आसानी होगी। डॉ. सिग्मंड फ्रायड ने बालकों के विकास से सम्बंधित अवस्थाओं का वर्णन किया है, जिनके आधार पर भविष्य में उनके व्यक्तित्व का गठन होता है। इन अवस्थाओं में माता-पिता अगर बालक का लालन-पालन समुचित रीती से कर सकें तो बालक भविष्य में अनेक मनोरोगों और व्यक्तित्व असंतुलन से बच जाता है।

5.8.1 व्यक्तित्व विकास की अवस्थाएँ

फ्रायड ने प्रस्तावित किया कि हम बचपन के दौरान पूर्व निर्धारित अनुक्रम में मनोवैज्ञानिक चरणों की एक श्रृंखला से गुजरते हैं। इन चरणों में ऐसी गतिविधियाँ होती हैं जो एक निश्चित कामोद्दीपक क्षेत्र के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इसमें अलग-अलग अवस्था में हमारे शरीर का एक ऐसा क्षेत्र या अंग विशेष उत्तेजना के प्रति संवेदनशील होता है। व्यक्तित्व के कुछ हिस्सों का विकास तब होता है जब हम इस मनो-यौन चरणों की एक श्रृंखला के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। प्रत्येक चरण में यौन संतुष्टि की विभिन्न मांगों और उस संतुष्टि को प्राप्त करने के विभिन्न तरीकों की विशेषता होती है। फ्रायड के अनुसार, एक मनोलैंगिक अवस्था से दूसरी अवस्था में सफलतापूर्वक जाने से हम एक स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास करते हैं। यदि बढ़ते हुए मनुष्यों के रूप में, हमें उचित मात्रा में संतुष्टि नहीं मिलती है या तो बहुत कम या बहुत अधिक मिलती है या हम एक विशेष चरण में स्थिर हो सकते हैं। अर्थात्, हमारे पास संतुष्टि की वही मांग बनी रहती है जो उस अवस्था में जीवन भर हमारे पास थी। ऐसा माना जाता है कि यह स्थिति विभिन्न प्रकार के वयस्क व्यवहारों को उत्पन्न करती है।

विटेन (1995) ने इस को परिभाषित करते हुए बताया है कि "फ्रायड के अनुसार मनोलैंगिक विकास की ऐसी अवस्थाएँ जिनमें विशिष्ट लैंगिक विशेषतायेँ पाई जाती हैं और ये व्यस्क व्यक्तित्व पर अपनी छाप छोड़ती हैं[2]

          APA Dictionary of Psychology के अनुसार "सिगमंड फ्रायड के मनोलेंगिक विकास के सिद्धांत में यौन जीवन की चरण-दर-चरण वृद्धि के बारे में स्पष्ट किया गया है क्योंकि यह व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करती है। फ्रायड ने कहा कि मनोवैज्ञानिक विकास के लिए प्रेरणा एक ऊर्जा स्रोत लिबिडो से कामेच्छा उत्पन्न होती है, जो शैशवावस्था में विभिन्न अंगों में केंद्रित होती है और विभिन्न मनोवैज्ञानिक चरणों का उत्पादन करने में मदद करती है: मौखिक चरण, गुदा चरण, फालिक चरण, विलंबता चरण और जननांग चरण। प्रत्येक चरण अपनी विशिष्ट कामुक गतिविधियों (जैसे, मौखिक चरण में चूसने और काटने) को जन्म देता है, और शुरुआती अभिव्यक्तियाँ जीवन में बाद में "विकृत" गतिविधियों को जन्म दे सकती हैं, जैसे कि परपीड़न, मर्दवाद, दृश्यरतिकता और प्रदर्शनीवाद। इसके अलावा, विभिन्न चरण व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व पर अपनी छाप छोड़ते हैं, खासकर अगर यौन विकास एक विशेष चरण में एक निर्धारण में गिरफ्तार हो जाता है[3]

इससे पता चलता कि मनुष्य के व्यक्तित्व के आंतरिक पक्ष उसके जीवन की प्रारंभिक अवस्था में ही स्थापित हो जाते हैं और फिर जीवन भर स्थिर बने रहते हैं। इनमें परिवर्तन लाना फिर अत्यंत कठिन होता है। फ्रायड ने कार्य के संपादन हेतु एक विशेष प्रकार की ऊर्जा के बारे में ऊपर बताया है जिसने लिबिडो नाम दिया है। या मानसिक ऊर्जा है। जिस प्रकार मनुष्य को अनेक प्रकार के कार्यों को सम्पादित करने के लिए भौतिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है ठीक उसी प्रकार मानसिक कार्यों को करने के लिए मनोवैज्ञानिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। लिबिडो को सामान्यतः सुखानुभूति (विशेषरूप से लैंगिक सुख ) की इच्छा के रूप में व्यक्त किया जाता है लेकिन फ्रायड के अनुसार इसका अर्थ काफी व्यापक है। यह केवल लैंगिक नहीं बल्कि सुख एवं संतुष्टि की किसी भी अवस्था में उपयोग होती है। परामर्शदाता के लिए इन मनोलैंगिक अवस्थाओं का ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि इनका मनोविकारों के उपचार से सीधा सम्बन्ध है। फ्रायड के अनुसार लिबिडो का केंद्र प्रत्येक अवस्था में शरीर के एक अंग विशेष पर केंद्रित होता है। सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व विकास को ‘‘मनोलैंगिक विकास’’ के नाम से अपने इस पंच अवस्था सिद्धान्त में व्यक्त किया है।  फ्रायड का मत था कि प्रत्येक अवस्था पर व्यक्ति को कुछ विशेष सामाजिक अनुभव होते हैं जो उसके व्यक्तित्व पर कुछ स्थाई असर मनोवृत्ति, शीलगुण तथा मूल्य के स्वरूप में छोड़ते हैं। इससे प्रत्येक अवस्था में व्यक्ति को दो प्रकार की अनुभूतियाँ, कुंठा की अनुभूति (experience of frustration) या अतिसेवन की अनुभूति (experience of indulgence) होती हैं।

अरुण कुमार सिंह अपनी पुस्तक 'आधुनिक असामान्य मनोविज्ञान' में इसके बारे में कहते हैं कि "जब बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति माँ-बाप द्वारा ठीक ढंग से नहीं की जाती है तब इससे उनमें कुंठा की अनुभूति जन्म लेती है और जब बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए माँ-बाप द्वारा उनकी आवश्यकता से ज्यादा प्रयास किया जाता है तो इससे बच्चों में अतिसेवन की अनुभूति जन्म लेती है। इन दोनों ही प्रकार की अनुभूतियों से व्यस्कावस्था में भिन्न-भिन्न प्रकार के शीलगुण, मनोवृत्ति तथा मूल्य आदि विकसित होते हैं। कभी-कभी किसी मनोलैंगिक अवस्था की समस्याओं का  बच्चा जब ठीक ढंग से समाधान नहीं कर पाता है तब आगे की अवस्थाओं में भी उसका व्यवहार उसी पिछली अवस्था की समस्या के समाधान करने के लिए अक्सर पहुँच जाता है। फ्रायड ने इसी अवस्था को स्थायीकरण (Fixation) नाम दिया है।  जैसे कभी-कभी 10 वर्ष के बच्चे को भी अचानक अपना अंगूठा चूसते देखा जाता है। जिसे मुखावस्था के स्थायीकरण का एक उदाहरण कहा जा सकता है।"[4]

फ्रायड का यह भी मानना ​​​​था कि अवस्थाएँ दो तरंगों में होने वाली चरणों की एक श्रृंखला में विकसित होते हैं। प्रारंभिक बचपन के दौरान पहले तीन चरण होते हैं, शैशवावस्था से लेकर लगभग 5 वर्ष की आयु तक। फ्रायड ने इस प्रारंभिक अवधि को प्रीजेनिटल चरण के रूप में संदर्भित किया है। फिर एक विलंबता अवधि होती है, जो यौवन तक चलती है, जिसके बाद अंतिम चरण, जननांग चरण का एहसास होता है और व्यक्ति शारीरिक रूप से परिपक्व प्रजनन कार्य करने में सक्षम होता है। इन चरणों को आम तौर पर प्रस्तुत किया जाता है जैसे कि वे अनन्य और अनुक्रमिक हैं। हालांकि यह सच है कि वे अनुक्रमिक हैं, वे पूरी तरह से अनन्य नहीं हैं। इसलिए, चरणों को ओवरलैप करना संभव है।

हालांकि, यह सच है कि एक विशेष चरण के दौरान शरीर का एक क्षेत्र प्रमुख होगा, और अधिकांश कामेच्छा उस क्षेत्र पर केंद्रित होगी। फ्रायड द्वारा बताई गई मनोलैंगिक विकास के सिद्धान्त की पाँच अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं –

(5.8.1.1) मुखावस्था (Oral Stage)

(5.8.1.2) गुदावस्था (Anal Stage)

(5.8.1.3) शिश्नावस्था (Phallic Stage)

(5.8.1.4) अव्यक्तावस्था (Latency Stage)

(5.8.1.5) जननेन्द्रियावस्था (Genital Stage)

 

5.8.1.1 मुखावस्था (Oral Stage)

मौखिक, मुखीय या मुखावस्था मनोलैंगिक विकास की पहली अवस्था है जो जन्म से लेकर एक या डेढ़ वर्ष की आयु तक होती है। जैसा की नाम से ही स्पष्ट होता है कि इस अवस्था में सुखानुभूति मुँह के द्वारा होती है। मौखिक गुहा के माध्यम से शिशु जीवनदायी पोषण प्राप्त करते हैं, लेकिन इसके अलावा, वे इसके माध्यम से भी चूसने की क्रिया द्वारा आनंद भी प्राप्त करते हैं। इस अवस्था में कामुकता का क्षेत्र मुँह बन जाता है जिसमें बच्चा चूसना, निगलना, जबड़े में कोई चीज दबाना तथा दाँत निकलने पर दाँतों से दबाना आदि करके लैंगिक सुख प्राप्त करता है। इस अवस्था को दो भागों में विभाजित किया जाता है - मुखवर्ती चूषण की अवस्था (oral sucking stage) तथा मुखवर्ती परपीड़न अवस्था (oral sadistic stage)

मुखवर्ती चूषण की अवस्था जन्म से लेकर 6 महीनों तक होती है। यह बच्चे के दाँत निकलने के पहले की अवस्था होती है। इसमें बच्चा माँ के स्तन या दूध की बॉटल के निप्पल को चूसकर आनंद लेता है। चूँकि इस अवस्था में चूसने की प्रधानता होती है तो बच्चा इसमें चरम पर पहुँच जाता है। जब स्तन या निप्पल नहीं मिलता तो वह अपना अँगूठा ही चूसने लगता है। इसे फ्रायड ने आत्मकामुकता या आत्मप्रेम (auto-eroticism or self-love) कहा है। इस अवस्था में आवश्यकता से अधिक या कम मुखवर्ती संतुष्टि प्राप्त होने से व्यक्तित्व एक खास प्रकार का हो जाता है। जिसे मुखवर्ती निष्क्रिय व्यक्तित्व कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति आशावादी तथा दूसरों पर अधिक विश्वास करने वाले होते हैं। इनमें निष्क्रियता तथा दूसरों पर ज्यादा निर्भरता की आदत पाई जाती है। इस अवस्था में स्थायीकरण हो जाने से व्यक्ति के बड़े होने पर उसमें पान चबाना, शराब पीना, सिगरेट पीना तथा चुम्बन में अत्यधिक आनंद लेना जैसी आदतें पाई जाती हैं। मुखवर्ती परपीड़न अवस्था का आरम्भ 7 वें महीने से माना जाता है जब बालक के दाँत निकलने शुरू हो जाते हैं। इस समय में माँ बच्चों स्तन से दूध पिलाना बंद कर देती हैं। जिससे बच्चों में कुंठा होती है और वह अपने आहार के लिए स्वनिर्देशित क्रियाएँ करना आरम्भ करता है। इसमें वह प्रतिक्रिया में दंतदंशन (biting) की क्रिया शुरू कर देता है। फ्रायड के अनुसार माँ का दूध न मिलने से बालक कुंठा में दाँत से काटना या चबाना की क्रिया करता है।[5]

इस अवस्था को इसी विशेषता के कारण मुखवर्ती दंतदंशन अवस्था (oral biting stage) तथा मुखवर्ती आक्रामक अवस्था (oral aggressive stage) भी कहा जाता है। इस अवस्था में माँ कुछ हद तक बच्चों को छोड़कर इधर-उधर के काम भी करने लगती हैं। जिससे शिशुओं में माँ के प्रति घृणा का भाव भी उत्पन्न हो जाता है लेकिन उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी माँ के द्वारा होती है इसलिए वह उसे प्यार भी करता है। इसलिए बालक में परस्पर विरोधी भाव (ambivalent feeling) उत्पन्न हो जाता है।  इस अवस्था का व्यक्ति के बड़े होने पर उसके व्यक्तित्व पर गहरा असर पड़ता है। इस अवस्था में कम या ज्यादा उत्तेजना होने से एक विशेष प्रकार का व्यक्तित्व विकसित होता है जिसे मुखवर्ती आक्रामक व्यक्तित्व (oral aggressive personality) कहते हैं। ऐसे व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति हेतु दूसरों का शोषण करते तथा उन पर अपना प्रभुत्व जमाते हैं। इस अवस्था में स्थायीकरण होने से व्यक्ति  निराशावादी, तार्किक एवं कटुस्वभाव वाला बन जाता है। व्यक्ति बड़ा होने पर तोड़-फोड़, क्रोध तथा अन्य प्रकार के परपीड़न कार्यों से खुश होते हैं।

मुखावस्था में शिशुओं में इड प्रवृत्तियों की ही प्रधानता पाई जाती है क्योंकि अभी उनमें अहं तथा सुपर ईगो की कोई चेतना नहीं होती है।

5.8.1.2 गुदावस्था (Anal Stage)

यह अवस्था जब शुरू होती है जब बच्चा एक या डेढ़ वर्ष के आसपास होता है और जब वह तीन साल का होता है तब समाप्त होती है।  कामुक क्षेत्र मुख से हटकर शरीर के गुदा क्षेत्र में आ जाता है। जहाँ बच्चे मल-मूत्र त्यागने से सम्बंधित क्रियाओं में आनंद लेने लगते हैं। इसमें भी दो प्रकार की क्रियाएँ होती हैं - गुदा निष्कासन क्रियाएँ (Anal expulsive activities) तथा गुदा प्रतिधारण क्रियाएँ (Anal retentive activities)

गुदा निष्कासन क्रिया की अवस्था में बालक की मल त्यागते समय श्लेष्मा झिल्ली (mucous membrane) उत्तेजित हो जाती है जिससे उसे एक लैंगिक सुख की अनुभूति होती है। इस समय माता-पिता द्वारा सही स्थान तथा सही समय पर नियमित रूप से मल त्यागने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है जिससे इस प्रशिक्षण के दौरान अपनाई गई मनोवृत्ति एवं विधियों का प्रभाव बच्चे के व्यक्तित्व के विकास पर पड़ता है। जब माता-पिता मल-मूत्र त्यागने के लिए शिशु की खुशामद करते हैं, सुसकारते हैं या सीटी बजाते हैं तो इससे उनमें आक्रामकता की प्रवृत्ति काफी हद तक बढ़ जाती है। बड़े होने पर ऐसे शिशु एक विशेष प्रकार का व्यक्तित्व धारण कर लेते हैं जिसे गुदा-आक्रामक व्यक्तित्व (anal aggressive personality) कहा जाता है। ऐसे व्यक्तित्व क्रूर, विनाशी, विद्वेषी तथा क्रमहीन आदि शील गुण प्रधान होते हैं।

गुदा प्रतिधारण क्रिया में शिशु मल-मूत्र को कुछ समय रोककर लैंगिक आनंद की अनुभूति करते हैं। मल-मूत्र रोकने से उनके मूत्राशय एवं आँत में एक हल्का सा तनाव उत्पन्न होता है जिससे उन्हें लैंगिक आनंद मिलता है। लेकिन ज्यादा देर रोक तो सकते नहीं इसलिए उन्हें उसे त्यागना पड़ता है इससे उनमें निराशा उत्पन्न होती है जो आगे चलकर उनके व्यक्तित्व के शील गुणों पर अपना असर डालती है। फ्रायड के अनुसार अगर यदि माता-पिता द्वारा मल-मूत्र त्यागने के प्रशिक्षण में क्रूरता या कठोरता बरती गई है तो ऐसे शिशु बड़े होने पर गुदा धारणात्मक व्यक्तित्व (anal retentive personality) कहलाते हैं।[6] जिनके व्यक्तित्व में हठ, कंजूसी, क्रमबद्धता तथा समयनिष्ठता आदि शील गुण पाए जाते हैं।

5.8.1.3 शिश्नावस्था (Phallic Stage)

इस अवस्था में एक नवीन कामुकता क्षेत्र का विकास होता है। यह नया कामुकता क्षेत्र जननेन्द्रिय होता है। यह मनोलैंगिक विकास की तीसरी अवस्था होती है। यह अवस्था शिशु कामुकता की परिणति का प्रतिनिधित्व करती है। हालांकि यह आम तौर पर 3 से 5 साल की उम्र के बीच होता है, लेकिन यह वयस्क कामुकता के लिए मंच तैयार करता है। इसलिए, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अवधि है। फ्रायड (1930) के अनुसार यह चरण "व्यक्ति की स्मृति में सबसे गहरे (बेहोश) छापों को पीछे छोड़ देगा; यदि व्यक्ति स्वस्थ रहता है तो वे उसके चरित्र का निर्धारण करते हैं और यदि वह यौवन के बाद बीमार हो जाता है, तो वे उसके न्यूरोसिस के लक्षणों का निर्धारण करते हैं[7]

इस अवस्था में बच्चे अपने जननेन्द्रिय को छूते हैं, मलते हैं तथा खींचते हैं। इससे उनके जननेन्द्रिय में संवेदन उत्पन्न होता है और उन्हें लैंगिक आनंद की प्राप्ति होती है। फ्रायड ने इस अवस्था में लड़के में मातृ मनोग्रंथि (oedipus complex) का विकास तथा लड़कियों में पितृ मनोग्रंथि (electra complex) विकसित होती है। इस अवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ओडिपस और इलेक्ट्रा परिसर है। (यह फ्रायड के सबसे विवादास्पद विचारों में से एक है और एक जिसे बहुत से लोग एकमुश्त खारिज करते हैं)। ओडिपस परिसर का नाम ग्रीक मिथक से लिया गया है जहां ओडिपस, एक युवक, अपने पिता को मारता है और अपनी मां से शादी करता है।

युवा लड़के में, ओडिपस कॉम्प्लेक्स या मातृ मनोग्रंथि का अधिक सही ढंग से कहा जाय तो संघर्ष उत्पन्न होता है क्योंकि लड़का अपनी मां के लिए यौन (सुखद) इच्छाएं विकसित करता है। वह अपनी मां को विशेष रूप से अपने पास रखना चाहता है और अपने पिता से छुटकारा पाना चाहता है ताकि वह ऐसा कर सके। तर्कहीन रूप से, लड़का सोचता है कि अगर उसके पिता को यह सब पता चल गया, तो उसका पिता उसे  ले लेगा जिसे वह सबसे ज्यादा प्यार करता है। फालिक अवस्था के दौरान लड़का जिसे सबसे ज्यादा बचाकर रखना चाहता है वह है उसका लिंग। उसे लगता है कि उसके पिता उसके लिंग को काट देंगे। इसलिए लड़के में बधिया होने की चिंता (castration anxiety) विकसित हो जाती है। इस अवस्था में लड़का अपने पिता के मरदाना व्यवहार की नक़ल करता है और अपनी पहचान मर्दाना दिखाने का प्रयास करता है, और इस तरह तीन से पांच साल का लड़का अपने ओडिपस परिसर को हल करता है। पहचान का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति के मूल्यों, दृष्टिकोणों और व्यवहारों को आंतरिक रूप से अपनाना। इसका परिणाम यह होता है कि लड़का पुरुष लिंग की भूमिका निभाता है, और एक अहंकार आदर्श और मूल्यों को अपनाता है जो सुपर ईगो बन जाते हैं। फ्रायड (1909) ने ओडिपस परिसर के साक्ष्य के रूप में लिटिल हंस केस स्टडी की पेशकश की।[8]

लड़कियों में इस अवस्था में पितृ मनोग्रंथि का विकास होता है। इसमें लड़की पिता की ओर आकृष्ट रहती है और माँ से घृणा करती है। इसमें लड़कियों में शिश्न ईर्ष्या (penis envy) पैदा हो जाती है जो लड़कों के बधिया होने की चिंता का ही एक समान रूप है। शिश्न ईर्ष्या में लड़की कल्पना करती है कि उसके पास भी उसके पिता या भाई के समान लिंग था लेकिन उसकी माँ ने उसे काट दिया। इससे स्वभावतः वह माँ के प्रति विद्वेषी हो जाती है। फ्रायड का मानना है कि जब लड़का मातृ-मनोग्रंथि और लड़की पितृ-मनोग्रंथि का सफलतापूर्वक समाधान कर लेते हैं तो इससे उनमें नैतिकता का विकास होता है। इन मनोग्रंथियों का समाधान दमन द्वारा तथा अपने माता-पिता के साथ आत्मीकरण करके किया जाता है। इससे लड़कों और लड़कियों में सुपर ईगो विकसित होती है। अगर इनका सही समाधान न किया जाय तो लड़कों के व्यक्तित्व में व्यस्क होने पर उतावलापन, शोखेबाजी, उच्चांकांक्षा आदि शील गुणों की प्रधानता हो जाती है और लड़कियों में इश्कबाजी, सम्मोहकता तथा स्वछंद संभोगता की प्रधानता हो जाती है।

5.8.1.4 अव्यक्तावस्था (Latency Stage)

यह निलीनावस्था भी कही जाती है क्योंकि इसमें बच्चों में कोई कामुकता क्षेत्र विकसित नहीं होता है। बच्चे इस अवस्था में अपनी यौनेच्छा को अनैतिक समझकर दमन कर देते हैं तथा बाहरी चीजों और घटनाओं में रूचि दिखाना आरम्भ कर देते हैं। सही अर्थों में कहा जाय तो इस अवस्था में लिबिडो का उद्दातीकरण हो जाता है। इस अवस्था बच्चा ऊर्जा को स्कूल के काम, चित्रकारी, हम उम्र के बच्चों के साथ खेल-कूद आदि में अभिव्यक्त करता है। इस अवस्था की आयु सीमा 6 से 12 के बीच मानी जाती है। इस अवस्था में बच्चा नैतिकता, सामाजिक आदर्शों को अच्छे से समझने लगता है तथा उसमें सुपर ईगो और मजबूत हो जाती है। यद्यपि विलंबता फ्रायड के सैद्धांतिक भवन में एक महत्वपूर्ण अवधारणा प्रतीत होती है, फ्रायड ने इसे विकसित करने के लिए अधिक प्रयास नहीं किए। फिर भी, अपने बाद के लेखन में, उन्होंने अक्सर इसका उल्लेख किया। 1924 में फ्रायड ने पुष्टि की कि उन्हें "इसमें कोई संदेह नहीं है कि ईडिपस परिसर, यौन धमकी (बधिया का खतरा), सुपर के गठन के बीच यहां वर्णित कालानुक्रमिक और कारण संबंध हैं। अहंकार और विलंबता अवधि की शुरुआत एक विशिष्ट प्रकार की होती है[9]

5.8.1.5 जननेन्द्रियावस्था (Genital Stage)

जननेन्द्रिय अवस्था फ्रायड के व्यक्तित्व विकास के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का अंतिम चरण है, और यौवन में शुरू होता है। यह किशोर के यौन प्रयोग का समय है, कहा जाता है।  इसमें यौन वृत्ति विषमलैंगिक सुख की ओर निर्देशित होती है, न कि स्व-आनंद की तरह, जैसे कि फालिक अवस्था के दौरान बताई गई थी। इस अवस्था के प्रारम्भ होते ही किशोरों और किशोरियों में अनेक तरह के शारीरिक परिवर्तन होते हैं तथा ग्रंथीय विकास परिपक्व हो जाते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप लड़कियों में स्तन का विकास तथा मासिक धर्म की शुरुआत होती है तथा लड़कों में दाढ़ी-मूँछ आने लगते हैं। जो कामेच्छा अव्यक्तावस्था में सुप्त हो गई थी वह यौवन की शुरुआत के कारण एक बार फिर सक्रिय हो जाती है। यह अवस्था यौवन के दौरान शुरू होती है लेकिन व्यक्ति के शेष जीवन भर चलती है। जननेंद्रिय अवस्था के आरम्भ में कुछ वर्ष तो किशोरों में समान लिंग के व्यक्तियों के साथ उठने-बैठने व बातचीत करने की प्रवृत्ति अधिक तीव्र होती है जो समय के साथ विपरीत लिंग की तरफ उन्मुख हो जाती है। फ्रायड ने यहाँ यह भी दवा किया जिसकी बहुत आलोचना की गई कि प्रारंभिक किशोरावस्था में सभी व्यक्ति में समलिंगकामुकता की प्रवृत्ति होती है। लेकिन जैसे व्यक्ति किशोरावस्था से वयस्कावस्था में प्रवेश करता है तो यह काम होकर विपरीत लिंग की तरफ प्रवृत्त हो जाती है। जहां पहले के चरणों में केवल व्यक्तिगत जरूरतों पर ध्यान केंद्रित किया जाता था, इस चरण के दौरान दूसरों के कल्याण में रुचि बढ़ती है। इस चरण का लक्ष्य विभिन्न जीवन क्षेत्रों के बीच संतुलन स्थापित करना है। यदि अन्य चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है, तो व्यक्ति को अब अच्छी तरह से संतुलित और देखभाल करने वाला होना चाहिए। विकास के पहले के कई चरणों के विपरीत, फ्रायड का मानना ​​​​था कि इस बिंदु पर अहंकार और सुपर ईगो पूरी तरह से गठित और कार्य कर रहे थे। विकास की इस अवस्था में किशोर वास्तविकता और सामाजिक मानदंडों की मांगों के अनुरूप अपने सबसे बुनियादी आग्रहों को संतुलित करने में सक्षम हो जाते हैं।

इन पांचों अवस्थाओं का सही से गुजरना ही एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण करता है। यदि पहले तीन चरणों में बहुत अधिक कामेच्छा ऊर्जा ली जाती है, तो व्यक्ति परिपक्वता तक नहीं पहुंच सकता है, अपने स्वयं के शरीर, अपने माता-पिता और अपनी तत्काल जरूरतों से अन्य लोगों को शामिल करने वाली बड़ी जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकता है। फ्रायड के सिद्धांत का मानव व्यक्तित्व के अध्ययन में काफी योगदान है और उसके संतुलन के लिए एक पृष्ठभूमि तो तैयार करता ही है। फ्रायड का सिद्धांत अचूक है - इसे न तो सही साबित किया जा सकता है और न ही इसका खंडन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, कामेच्छा का परीक्षण करना और निष्पक्ष रूप से मापना मुश्किल है। फ्रायड के सिद्धांत ने विकास में प्रारंभिक अनुभवों के महत्व पर भी बल दिया। जबकि विशेषज्ञ प्रारंभिक बनाम बाद के अनुभवों के सापेक्ष योगदान पर बहस करना जारी रखते हैं, विकास विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रारंभिक जीवन की घटनाएं विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और पूरे जीवन में स्थायी प्रभाव डाल सकती हैं।

बच्चे के प्रथम 12 वर्ष के लिए फ्रायड का मनो लैंगिक गठन का व्यक्तित्व सिद्धान्त एक अच्छी नींव को रखने में सहायक सिद्ध हो सकता है। पहले पाँच या छह वर्ष तो बच्चा माता-पिता के पास ही रहता है तथा उसका शिक्षक से परिचय नहीं होता है। माता-पिता को यह विचार छोड़ देना चाहिए कि बच्चा एक अबोध जीव है तथा वह कुछ भी सोच या समझ नहीं सकता। यदि बच्चे का दिमाग इतना सूक्ष्मग्राही न होता तो वह अल्पकालीन समय में इतने अनुभव नहीं समेट सकता था। शिशु की स्मृति बहुत गहरी तथा चिरस्थाई होती है, जो अचेतन मन में दबी रहती है। इसलिए माता पिता को बच्चे की उपस्थिति में कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे उसकी कोमल भावनाओं अर्थात 'संवेग संतुलन' को चोट पहुँचें। क्योंकि शिशु जो बाते समझ नहीं सकते वे उनके अचेतन मन पर अंकित हो जाती हैं तथा उनके भविष्य के जीवन में उनके आचार-व्यवहार पर सीधा प्रभाव डालती हैं। फ्रायड का भी मानना ​​​​था कि हमारे बचपन की घटनाओं का हमारे वयस्क जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है, ये घटनाएं हमारे व्यक्तित्व को आकार देती हैं। वी० डब्लू० सिल्वरबर्ग (1952) ने अपनी  पुस्तक में लिखा है कि "फ्रायड ने अपने द्वारा किये उपचारों के दौरान पाया कि न्यूरोसिस दर्दनाक बचपन के अनुभव और इसके विशिष्ट विवरणों से उभरता है[10] न्यूरोसिस, एक मनोवैज्ञानिक विकार है जो किसी व्यक्ति की वास्तविकता की धारणा को बाधित किए बिना जीवन की गुणवत्ता में हस्तक्षेप करता है। इसका सम्बन्ध बचपन की अनुभूतियों तथा विचारों से होता है।

माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी निजी महत्वकांक्षाएँ, अपने चेतन, अचेतन के अंतर्द्वंदों से बालक को दूर रखें। माता-पिता बच्चे की प्रथम तीन मनोलैंगिक विकास की अवस्थाओं के सीधे प्रत्यक्षदर्शी तथा सहयोगी होते हैं। उनकी जिम्मेदारी है कि वह इन तीन अवस्थाओं (मुखावस्था, गुदावस्था तथा शिश्नावस्था) में बच्चे में स्थायीकरण (Fixation) की प्रवृत्ति न पनपने दें तथा प्रत्येक अवस्था का सही समाधान उसे कराएँ ताकि जीवन में आगे चलकर यह उसके व्यक्तित्व के मनोसंघर्ष का कारण न बनें। प्रथम पांच वर्ष जब बालक माता-पिता के संरक्षण में रहे तो अभिभावकों को उसके निजी व्यक्तित्व को खुल कर विकसित होने की संभावनाओं के निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। जब बच्चा स्कूल जाने लगे तो शिक्षकों और माता-पिता को चाहिए कि वे केवल उसे किताबों को रटने-रटाने में न लगे रहें। केवल किताबी ज्ञान बच्चे के भीतर उड़ेलने में वे उसके मानसिक और व्यक्तित्व विकास तथा मूल प्रवृत्तियों की अवहेलना करने लग जाते हैं। जबकि शिक्षक और माता-पिता का कर्तव्य केवल अक्षर बोध कराना नहीं बल्कि उनके जीवन की ग्रंथियों को सुलझाने में सहायता देना भी है। उनका कर्तव्य है कि वे बच्चे के व्यक्तित्व को पहचानें तथा उसे उसके विकास के लिए उपर्युक्त वातावरण भी दें। पांच से दस वर्ष की अवस्था में बच्चे की चेतन भावना अग्रसर हो जाती है तथा वह आज्ञाकारी बालक तथा उत्सुक विद्यार्थी बनने का प्रयास करता है।

छह वर्ष की अवस्था में बालक अव्यक्तावस्था में प्रवेश करता है। उसकी इड की विभिन्न भावनायें दब जाती हैं तथा वह अपने गुण और दोषों की आलोचना करने लग जाता है। इस आयु में उसके सामाजिक व्यवहार में बड़ा अंतर देखा जाता है। दस वर्ष की आयु आते-आते बच्चे का सुपर ईगो पूर्णतः विकसित हो जाता है। इसके बोझ से उसका व्यक्तित्व पहले से ही दबाव में होता है, ऐसे समय माँ-बाप तथा शिक्षकों द्वारा और अधिक दबाव डालना उस पर भारी अत्याचार करने के समान है। अधिकतर इस समय बच्चे दब्बु, कुंठित, आक्रामक, जिद्दी तथा अवज्ञाकारी इसी कारण बनते देखें जाते हैं। माँ-बाप जानते ही नहीं कि उनका इस समय किया गया अनुचित व्यवहार बच्चे की मानसिक टांगों को तोड़ रहा है जिससे वह भविष्य में स्वछंद रूप से फल-फूल नहीं सकेगा। कभी-कभी बालक की साधारण इच्छाएँ भी बलपूर्वक दबा दी जाती हैं जो दबाने से समाप्त नहीं होतीं, बल्कि उसके अव्यक्त मन में घर कर लेती हैं। यही आगे चलकर उसकी मानसिक व्याधियों का कारण होती हैं। फ्रायड का मानना ​​​​था कि लोगों की कामुक इच्छाएँ जीवन के शिशु अवस्था में बनती हैं और बचपन की दर्दनाक घटनाएँ जीवन में बाद में किसी व्यक्ति पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। उनका मानना ​​​​था कि बचपन के शुरुआती यौन अनुभव एक वयस्क के व्यक्तित्व को निर्धारित करने वाले कारक होते हैं। बच्चे की लिबिडो ऊर्जा को उचित रीती तथा उचित तरीके से नियोजित करने का मार्ग भी प्रशस्त करना भी आवश्यक है।

प्राचीन कहावत है कि ऊर्जा अपना पुर्जा खोज ही लेती है, अर्थात अगर ऊर्जा का सही उपयोग न किया जाय तो वह अपने  उपयोग का मार्ग स्वयं खोज लेगी भले ही वह उपयोग, दुरूपयोग क्यों न हो। संसार की अन्य वस्तुओं की तरह बालक कई बार अपने शरीर के विभिन्न अंगों के बारे में प्रश्न करता है, जिसके लिए कई बार माता-पिता उसे डाँट देते या चुप करा देते हैं या गन्दी बातों का हवाला देकर आगे ऐसा न पूछने को कहते हैं। यह सब बालक की उत्सुकता को और बढ़ा देता है तथा उसका मन हर हाल में अपने भीतर उठ रहे प्रश्नों का उत्तर चाहता ही है। बालक जानना चाहता है कि लड़के और लड़की की शारीरिक बनावट में भेद क्यों है ? उसकी माँ उसके पिता को राखी क्यों नहीं बांधती बल्कि मामा को बांधती हैं।  ऐसे उनके सवालों का समाधान माता-पिता से नहीं मिलने पर बच्चे अन्यों से इसका उत्तर चाहते हैं और वहाँ से उन्हें भ्रामक या उनके व्यक्तित्व को पद भ्रष्ट करने वाला ज्ञान मिलने की सम्भावना अधिक होती है। बच्चों को जैसे कान, नाक, मुँह जैसे अंगों का परिचय माता-पिता देते हैं वैसे ही उचित तरीके जननेन्द्रिय अंगों का परिचय भी कराना चाहिए ताकि भविष्य में उन पर बच्चे विश्वास कर सकें। फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त के सही आरोपण से बच्चे की आयु की विभिन्न अवस्थाओं में उसके भीतर और बाहर घटित होने वाले व्यवहारों समाधान किया जा सकता है। इड की इच्छाओं का समयानुकूल तथा सुपर ईगो की मर्यादा का ध्यान रखते हुए उचित रीती से किया जाय जिससे उसके अचेतन और चेतन में विद्यमान वृत्तियाँ उसके व्यक्तित्व में मनोसंघर्ष की स्थिति पैदा न कर सकें। फ्रायड का मनोविश्लेषण सिद्धान्त विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास में एक मुख्य भूमिका निभा सकता है। इसके लिए आवश्यकता है एक समझदार था नवीनोन्मुख माता-पिता तथा शिक्षक की।


- Dr Raveesh Kumar



[1] Miller, Jane (2009) Changing English Vol. 16, London: Taylor & Francis Group, p. 437

[2] Weiten, Wayne (1995) Psychology Applied to Modern Life, Belmont CA: Wadsworth Publishing Co, p. 327

[3] American Psychological Association Dictionary of Psychology, https://dictionary.apa.org/psychosexual-development

[4] सिंह, अरुण कुमार, (2008), आधुनिक असामान्य मनोविज्ञान, नई दिल्ली : श्री जैनेन्द्र प्रेस, पृ० - 216

[5] Philip, Tomy (2019) Psychosexual Development: Freudian Concept, Cebu, Philippines: University of Cebu, p. 183

[6] Freud, Sigmund (1922) Introductory Lectures on Psycho-analysis, London: Allen & Unwin Ltd., p. 265

[7] Freud, Sigmund (1930) Three Contributions to the Theory of Sex, New York: Dover Publication, p. 49

[8] Thwaites, Tony (2007) Reading Freud: Psychoanalysis as Cultural Theory, London: SAGE Publication, p. 147

[9] David J. Rothman & others, (1995) Medicine and Western Civilization, London: Rutgers University Press, p. 110

[10] Silverberg, William V (1952) Childhood Experience and Personal Destiny A Psychoanalytical Theory of Neurosis, New York: Springer Publishing Company, p. 89

Friday, October 6, 2023

हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ

 हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ



 हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ

आशा और निराशा के
पल जब जीवन में आते हैं
तब मैं आशा को चुनता हूँ

हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ

जिंदगी के हर सवाल पर
जब दिल दिमाग़ टकराते हैं
तब मैं दिल की सुनता हूँ

हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ

छोटे छोटे स्वार्थ की खातिर
जब लोग दग़ा दे जाते हैं
तब मैं शिकवे ना करता हूँ

हाँ मैं कुछ सपने बुनता हूँ

- रवीश कुमार

Wednesday, October 4, 2023

डॉ. सिग्मण्ड फ्रायड मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त : रक्षात्मक युक्तियाँ

रक्षात्मक युक्तियाँ ऐसे व्यवहार हैं जिनका उपयोग लोग अप्रिय घटनाओं, कार्यों या विचारों से खुद को अलग करने के लिए करते हैं। रक्षात्मक युक्तियाँ मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत के अंतर्गत आती हैं। मनुष्य व्यक्तित्व के तीन उपतंत्रों के इड, अहं और सुपर ईगो के कारण मानवी व्यक्तित्व में खींचतान चलती रहती है, ये मनोवैज्ञानिक रणनीतियाँ इस खींचतान का पर्दाफाश बाहरी दुनिया के लोगों के सामने प्रकट होने के खतरे से बचाने के लिए व्यक्ति द्वारा अपनाई जाती हैं। पहली बार सिगमंड फ्रायड द्वारा प्रस्तावित, यह सिद्धांत समय के साथ विकसित हुआ है और यह तर्क देता है कि व्यवहार, जैसे रक्षा तंत्र, किसी व्यक्ति के सचेत नियंत्रण में नहीं हैं। वास्तव में, ज्यादातर लोग इसे साकार किए बिना करते हैं। इन सिद्धांतों के अनुसार, रक्षा युक्तियाँ  मनोवैज्ञानिक विकास का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। यह पहचानना कि आप, आपके प्रियजन और यहां तक ​​कि आपके सहकर्मी किस प्रकार का उपयोग करते हैं, भविष्य की बातचीत और मुठभेड़ों में आपकी मदद कर सकते हैं। रक्षा युक्तियाँ वे तरीके हैं जिनसे आप उन स्थितियों पर प्रतिक्रिया करते हैं जो नकारात्मक भावनाओं को सामने लाती हैं। मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत के अनुसार, जब आप एक तनाव का अनुभव करते हैं, तो अवचेतन पहले स्थिति की निगरानी करेगा कि क्या यह आपको नुकसान पहुंचा सकता है। यदि अवचेतन को लगता है कि स्थिति से भावनात्मक नुकसान हो सकता है, तो यह आपकी रक्षा के लिए एक रक्षा तंत्र के साथ प्रतिक्रिया कर सकता है। ये समस्या का समाधान नहीं करती हैं बल्कि समस्या के स्वरूप को विकृत कर हमें चिंता से तुरंत के लिए राहत प्रदान करती हैं।

फ्रायड ने पहली बार 1926 में रक्षा तंत्र के विचार पर विस्तार से बताया और उनकी बेटी अन्ना फ्रायड ने अवधारणा को और परिष्कृत और व्यवस्थित किया। रक्षा प्रक्रमों में दो विशेषताएँ पाई जाती हैं -

1.    रक्षा प्रक्रम अचेतन स्तर पर कार्य करते हैं इसलिए व्यक्ति को इनके सक्रीय होने का ज्ञान नहीं रहता है। अतः ये आत्म-भ्रामक होते हैं।

2.    रक्षा प्रक्रम व्यक्ति के दुश्चिंता के तीव्रता स्तर को तुरंत कम करके उसे राहत पहुँचाने का ढोंग करके वास्तविकता के ज्ञान से विकृत कर देते हैं।

रक्षा प्रक्रम शब्द का प्रयोग पहली बार सिगमंड फ्रायड के पेपर "द न्यूरो-साइकोज ऑफ डिफेंस" (1894) में किया गया था।[1] डॉ सिग्मंड फ्रायड और उनकी पुत्री अन्ना फ्रायड ने अनेक रक्षा युक्तियों का वर्णन किया है। जिसमें कुछ मुख्य रक्षा युक्तियाँ निम्नलिखित हैं –

Ø  दमन (Repression) - फ्रायड के अनुसार यह सबसे प्रमुख रक्षा युक्ति है, यह हर दूसरे में शामिल है। यह व्यक्ति के पूरे जीवनकाल कायम रहती है। इड की इच्छाओं की पूर्ति से जब अहं इंकार कर देता है तो वह इच्छाएँ दमित होकर अचेतन में बैठ जाती हैं। दमित यादें अवचेतन साधनों के माध्यम से और परिवर्तित रूपों में प्रकट हो सकती हैं, जैसे स्वप्न या जबान का फिसलना।

Ø  युक्तिकरण (Rationalization) - बहाने बनाना इसका सामान्य अर्थ है। युक्तिकरण अन्ना फ्रायड द्वारा प्रस्तावित एक रक्षा तंत्र है जिसमें किसी घटना या आवेग को कम खतरनाक बनाने के लिए "तथ्यों" की संज्ञानात्मक विकृति शामिल है। जब हम खुद को बहाने देते हैं तो हम इसे काफी सचेत स्तर पर करते हैं। लेकिन बहुत से लोगों के लिए, संवेदनशील अहंकार के साथ, बहाने बनाना इतना आसान हो जाता है कि उन्हें इसके बारे में कभी पता ही नहीं चलता। दूसरे शब्दों में, हम में से बहुत से लोग अपने झूठ पर विश्वास करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस प्रक्रम में व्यक्ति अपनी असफलताओं के लिए सामाजिक स्वीकार्य बहाने बनाता है।  उदाहरण के लिए परीक्षा में कम मार्क्स आने पर विद्यार्थी का यह कहना कि हॉस्टल का वातावरण अच्छा नहीं था।

Ø  प्रतिगमन ( Regression) - इसका शाब्दिक अर्थ होता है पीछे की ओर लौटना। रिग्रेशन रिट्रीट के रूप में कार्य करता है, एक व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से उस अवधि में वापस जाने में सक्षम बनाता है जब व्यक्ति सुरक्षित महसूस करता था। जब एक व्यस्क बच्चे की तरह व्यवहार करता है तो वह प्रतिगमन की अवस्था होती है। क्योंकि व्यक्ति अपने तनाव एवं चिंता को कम करने के लिए अपने सुखमय अतीत में लौटने की क्रिया कर रहा होता है। देखा गया है जब व्यक्ति दुखी, परेशान या भयभीत होते हैं, तो उनके व्यवहार अक्सर अधिक बचकाने या आदिम हो जाते हैं।

Ø  प्रक्षेपण ( Projection) - दूसरों पर अपनी कमियाँ, कमजोरियाँ आरोपित करना ही प्रक्षेपण कहा जाता है। फीस्ट एवं ग्रेगोरी जे (2008) के अनुसार "जब एक आंतरिक आवेग बहुत अधिक चिंता को भड़काता है, तो अहं अवांछित आवेग को बाहरी वस्तु, आमतौर पर  आपके किसी करीबी या पुत्र के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उस चिंता को कम कर सकता है। यह प्रक्षेपण का रक्षा तंत्र है[2] जब व्यक्ति स्वयं में कमियाँ होने से इंकार करके उन्हें दूसरे लोगों या वातावरण के प्रति अपनी अमान्य प्रस्तुतियों, मनोवृत्तियों एवं व्यवहारों के रूप में आरोपित करता है।

Ø  प्रतिक्रिया निर्माण (Reaction Formation) - इस मनोरचना में व्यक्ति अपने अहं को किसी अप्रिय इच्छा तथा प्रेरणा से ठीक उसके उलट इच्छा या प्रेरणा विकसित कर बचाता है।  प्रतिक्रिया गठन को अन्ना फ्रायड ने "विपरीत विश्वास" कहा, एक मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र है जिसमें एक व्यक्ति इनकार से परे जाता है और विपरीत तरीके से व्यवहार करता है जिसके लिए वह सोचता है या महसूस करता है। एक व्यक्ति अपने सामाजिक रूप से अस्वीकार्य अचेतन विचारों या भावनाओं के बारे में जो चिंता महसूस करता है, उसकी भरपाई के लिए सचेत व्यवहार को अपनाया जाता है। आमतौर पर, एक प्रतिक्रिया गठन को अतिरंजित व्यवहार, जैसे दिखावटीपन और मजबूरी से चिह्नित किया जाता है। फिस्ट (2008) के अनुसार "एक ऐसा भेष धारण करना जो सीधे अपने मूल रूप के विपरीत हो। इस रक्षा व्यवस्था को प्रतिक्रिया निर्माण कहा जाता है। प्रतिक्रियाशील व्यवहार को उसके अतिरंजित चरित्र और उसके जुनूनी और बाध्यकारी रूप द्वारा पहचाना जा सकता है[3] एक भ्रष्ट नेता द्वारा भ्रष्टाचार पर भाषण देना इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

Ø  उदात्तीकरण (Sublimation) - इस प्रक्रम में व्यक्ति अपनी असंतुष्ट इच्छाओं की पूर्ति समाज द्वारा स्वीकृत लक्ष्यों या उद्देश्यों के रूप में प्रतिस्थापित करके करता है। उत्थान विस्थापन के समान है, लेकिन यह तब होता है जब हम अपनी अस्वीकार्य भावनाओं को विनाशकारी गतिविधियों के बजाय रचनात्मक और सामाजिक रूप से स्वीकार्य व्यवहारों में विस्थापित करने का प्रबंधन करते हैं। उच्च बनाने की क्रिया अन्ना फ्रायड के मूल रक्षा तंत्रों में से एक है। एक निसंतान महिला का बाल कल्याण केंद्र खोलना इसका अच्छा उदाहरण है।

Ø  विस्थापन (Displacement) - विस्थापन तब होता है जब इड कुछ ऐसा करना चाहता है जिसकी अनुमति सुपर ईगो नहीं देता है। इस प्रकार अहं, इड की मानसिक ऊर्जा को मुक्त करने का कोई अन्य तरीका ढूंढता है। इस प्रकार एक दमित वस्तु कैथेक्सिस से अधिक स्वीकार्य वस्तु में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है। ये भावनाएँ आक्रामकता से सम्बंधित होती हैं और व्यक्ति किसी वस्तु विशेष या व्यक्ति से हटाकर किसी दूसरे पर विस्थापित कर देता है। जैसे ऑफिस में बॉस से डाँट खाने पर व्यक्ति घर आकर बच्चों को डाँटकर अपने गुस्से को निकाल लेता है।

Ø  नकारना (Denial) - ऐसी घटना जो व्यक्ति के लिए अत्यंत कष्टप्रद और अरुचिकर होती है तो व्यक्ति उसके अस्तित्व को ही मानने से इंकार कर देता है और थोड़े समय के लिए अपने को तकलीफ से बचा लेता है। इनकार सबसे आम रक्षा तंत्रों में से एक है। यह तब होता है जब आप वास्तविकता या तथ्यों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। इनकार में लोग बाहरी घटनाओं या परिस्थितियों को अपने दिमाग से रोक सकते हैं ताकि उन्हें भावनात्मक प्रभाव से निपटना न पड़े। दूसरे शब्दों में, वे दर्दनाक भावनाओं या घटनाओं से बचते हैं।

उपरोक्त के अलावा भी अनेक रक्षा युक्तियाँ होती है जिनका उपयोग व्यक्ति अपने अहं की रक्षा हेतु करता है। व्यक्ति इन रक्षा युक्तियों का उपयोग भले ही करता हो लेकिन वह इनके प्रति जागरूक नहीं होता तथा इनसे अनभिज्ञ भी होता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आप व्यवहार को संशोधित या बदल नहीं सकते हैं। वास्तव में, आप अस्वस्थ रक्षा तंत्रों को अधिक टिकाऊ रक्षा तंत्रों में बदल सकते हैं।



[1] Freud, Sigmund (2014) The Neuro-Psychoses of Defence, New York: Read Book Publisher

[2] Fiest, Gregory J. (2008) Theories of Personality, New York: McGraw-Hill company, p. 37

[3] Fiest, Gregory J. (2008) Theories of Personality, New York: McGraw-Hill company, p. 35

Sunday, October 1, 2023

फ्रायड मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त : व्यक्तित्व की अध्ययन विधियाँ

सभी लोग अपनी सोच और व्यवहार में अपने "गतिशील अचेतन" या विचारों, यादों और भावनाओं के संग्रह से प्रभावित होते हैं, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं होती है। लोग अचेतन विचारों, इच्छाओं या भावनाओं के जवाब में रक्षा तंत्र विकसित करते हैं जो सतह पर आने पर उन्हें चिंता या शर्म का अनुभव कराते हैं। रक्षा तंत्र में इनकार, विनाशकारी सोच पैटर्न, दमन, और बहुत कुछ शामिल हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पूर्वचेतन मन और व्यक्ति की सचेत मान्यताओं के बीच संघर्ष के परिणामस्वरूप होती है। मन अक्सर इन प्रतिस्पर्धी इच्छाओं और लक्ष्यों के लिए "समझौता" विकसित करने का प्रयास करता है। ऑस्ट्रियाई न्यूरोलॉजिस्ट सिगमंड फ्रायड ने 19 वीं शताब्दी के अंत में मनोविश्लेषण विकसित किया। आज, मनोविश्लेषण चिकित्सक लोगों को उनकी अचेतन भावनाओं और यादों को उजागर करने, सोच और व्यवहार के नकारात्मक पैटर्न की पहचान करने और पिछले आघात से उबरने में मदद करते हैं। मनोचिकित्सा, जिसे टॉक थेरेपी के रूप में भी जाना जाता है, लोगों को भावनात्मक संकट, तनाव, संघर्ष और मानसिक स्वास्थ्य विकारों का प्रबंधन करने में मदद करने का एक तरीका है। फ्रायड की मनोचिकित्सा की विधियों को मनोविश्लेषण, व्यक्तित्व विश्लेषण तथा व्यक्तित्व अध्ययन की प्रविधियों के नाम से जाना जाता हैं। अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (APA) के अनुसार "मनोविश्लेषण चिकित्सा का लक्ष्य उन सोच और व्यवहार के पैटर्न की पहचान करना है जो भावनात्मक संकट का कारण बनते हैं[1] मनोविश्लेषण सिद्धान्त की अध्ययन प्रविधियों के अंतर्गत निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है -

(5.6.1) मुक्त साहचर्य (Free Association)

(5.6.2) स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis)

(5.6.3) अंतरण विश्लेषण (Analysis of Transference)

(5.6.4) अवरोध विश्लेषण (Analysis of Resistance)

(5.6.5) स्पष्टीकरण (Interpretation)

5.6.1 मुक्त साहचर्य (Free Association)

फ्रायड द्वारा विकसित, मुक्त संघ या मुक्त साहचर्य एक मनोविश्लेषणात्मक तकनीक है जिसमें रोगी को चेतना की धारा में अपने दिमाग में जो कुछ भी है, उसके बारे में खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित करना शामिल है। व्यक्ति के अचेतन में दमित सामग्री सदैव बहार निकलने के लिए रास्ते खोजती रहती है। यह हमारे दैनिक जीवन में आक्रामकता, कामुक मजाक और जबान फिसलना आदि माध्यम से बाहर निकलती भी है लेकिन बड़ा पक्ष भीतर कुलबुलाहट मचाता रहता है। मुक्त साहचर्य के माध्यम से परामर्शदाता रोगी को शांत करके उसके बाल्यकालीन यादों, भावनात्मक अनुभवों को बिना किसी हिचक के प्रकट करने को कहता है। वह उसे प्रेरित करता है कि वह परामर्शदाता पर विश्वास करके सब प्रकट करे, कुछ न छुपाये। रोगी द्वारा प्रकट किये विचारों को सुसंगत होने की आवश्यकता नहीं है। वह कुछ भी ऐसा प्रकट कर सकता है जिसकी कोई संगत न बैठती हो लेकिन अगर वे प्रामाणिक हैं तो यह उसके निदान में बड़े काम की होती है। प्राचीन भारत में इससे मिलती जुलती प्रक्रिया ग्रामीण से लेकर शहरी परिवेश में पाई जाती है जिसको कहा जाता है "मन हल्का करना।"

डॉ. सिग्मंड फ्रायड 1892 से 1898 तक मुक्त जुड़ाव विकसित करने की प्रक्रिया में थे। उन्होंने अचेतन की खोज के लिए इसे एक नई विधि के रूप में उपयोग करने की योजना बनाई। यह इस संबंध में सम्मोहन की जगह लेगा। फ्रायड ने दावा किया कि मुक्त संगति ने चिकित्सा में लोगों को उनके विचारों की जांच करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी। यह स्वतंत्रता, आंशिक रूप से, एक चिकित्सक द्वारा संकेत या हस्तक्षेप की कमी से आएगी। फ्रायड ने प्रस्तावित किया कि तकनीक ने चिकित्सा में तीन सामान्य मुद्दों को रोकने में मदद की -

Ø  स्थानांतरण - एक व्यक्ति के लिए दूसरे व्यक्ति में भावनाओं को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया।

Ø  प्रक्षेपण - अपने गुणों को किसी और पर प्रक्षेपित करने की प्रक्रिया।

Ø  प्रतिरोध - कुछ भावनाओं या यादों को अवरुद्ध करने का अभ्यास।

एंड्री और बार्टन (2021) अपने लेख Free association in psychoanalysis and its links to neuroscience contributions में मुक्त साहचर्य के बारे में अपने विचार लिखते हैं कि मनोविश्लेषण में मुक्त संघ को अपेक्षाकृत सीमित सचेत सेंसरशिप के साथ विचार की अभिव्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। तंत्रिका विज्ञान में, एफ० ए० को मस्तिष्क के एक समूह के हिस्से के रूप में अध्ययन किया गया है और मानसिक गतिविधियों को सहज मानसिक प्रक्रियाओं के रूप में जाना जाता है। वे स्वयं उत्पन्न और आवक-निर्देशित अभिविन्यास के विचारों की सहज अभिव्यक्ति हैं। हम कह सकते हैं कि फ्री एसोसिएशन उपचार में एक रचनात्मक चिकित्सीय परिवर्तन का कारण बन सकता है जो आत्मनिरीक्षण, नैतिक और सामाजिक अनुकूलन का पक्षधर है[2]

5.6.2 स्वप्न विश्लेषण (Dream Analysis)

फ्रायड के अनुसार स्वप्न व्यक्ति के अचेतन में विद्यमान दमित इच्छाओं का प्रतिफलन है। स्वप्न में व्यक्ति जो कुछ देखता है, वे सभी अचेतन में दमित इच्छाओं के एक छदम रूप होता है। इसके वास्तविक स्वरूप के बारे में स्वप्न विश्लेषण से पता चल सकता है। स्वप्न के दो विषय होते हैं -

Ø  व्यक्त विषय (manifest content) - व्यक्ति स्वप्न में देखी हुई घटनाओं का नींद खुलने पर प्रत्यक्ष वर्णन कर देता है।

Ø  अव्यक्त विषय (latent content) - व्यक्ति द्वारा नींद खुलने पर वर्णित स्वप्न के छुपे हुए विषय और उनका अर्थ, जिनका पता स्वप्न विश्लेषण से लगता है।

डॉ. सिग्मंड फ्रायड का मत था कि व्यक्ति की अनैतिक, कामुक एवं असामाजिक इच्छाओं की पूर्ति रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं हो सकती है इसलिए व्यक्ति ऐसी इच्छाओं को अचेतन में दमित कर देता है और अचेतन में यह इच्छाएं समाप्त नहीं हो जाती हैं वरन मौका पाकर चेतन में प्रवेश कर अपनी संतुष्टि चाहती हैं। लेकिन अहं का सेंसर इन्हें चेतन में प्रवेश करने नहीं देता है तो यह व्यक्ति के सोते समय अभिव्यक्त होकर अपनी संतुष्टि कर लेती हैं क्योंकि व्यक्ति की सुप्तावस्था में अहं का सेंसर थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसलिए फ्रायड ने स्वप्न के स्वरूप को इच्छापूर्ति करने वाला कहा है। अपनी पुस्तक ‘The interpretation of dreams’ (1955) में डॉ. सिग्मंड फ्रायड ने स्वप्न के विषय में कहा है कि "मन की अचेतन गतिविधियों के ज्ञान के लिए सपनों की व्याख्या शाही मार्ग है[3]

इस विधि में परामर्शदाता रोगी से अपने दैनिक प्रश्नों को सच-सच बताने को कहता है। परामर्शदाता उन सपनों को नोट करता जाता है। फिर वह इनका विश्लेषण करता है। विश्लेषण में वह व्यक्त और अव्यक्त स्वप्नों में छुपे अर्थों को समझकर रोगी का निदान करता है। फ्रायड ने स्वप्नों के विश्लेषण और अध्ययन में मनुष्य की स्वप्न निर्माण की कला के बारे में जाना। इसके विषय में लेखक लालजी राम शुक्ल (1947) ने अपनी पुस्तक मानसिक चिकित्सा में ने लिखा है कि "जो मनुष्य आत्म-स्वीकृति से जितना ही अधिक भागता है उसके स्वप्न उतने ही अधिक अस्पष्ट होते हैं। जब मनुष्य रोग से तंग होकर अपने अभिमान को खो देता है और आत्म-स्वीकृति करने के लिए तत्पर होता है तब उसके स्वप्न भी स्पष्ट हो जाते हैं[4] स्वप्न निर्माण में मनुष्य का अचेतन मन विशेष प्रकार की  रचनाओं या कलाओं से काम लेता है। फ्रायड के अनुसार ये निम्नलिखित पाँच प्रकार की होती हैं –  संक्षेपण (Condensation), विस्थापन (Displacement), प्रतीकीकरण (Symbolization), नाट्कीयकरण (Dramatization), गौण विस्तारण (Secondary Elaboration)

कभी-कभी स्वप्न का विचार बहुत बड़ा होता है। हमारे मन की एक सामान्य भावना भी एक लम्बे स्वप्न में प्रदर्शित होती है। कभी ऐसा होता है कि हम स्वप्न में अपने मनोभावों को किन्हीं दूसरों पर आरोपित करते हैं। कभी स्वप्न किसी कथानक या नाटक के रूप में हम देखते हैं और उसमें स्वयं को नायक या पीड़ित की भूमिका में पाते हैं। जैसे फ्रायड ने स्वप्नों के संकेतों का स्पष्टीकरण में कुछ उदाहरण दिए, स्वप्न में देखे खम्भे, बच्चे और सांप जननेन्द्रिय के बोधक हैं। हवा में उड़ना, पानी में तैरना, सीढ़ी चढ़ना इत्यादि रति क्रिया के बोधक हैं। 

5.6.3 अंतरण विश्लेषण (Analysis of Transference)

स्थानांतरण, जिसे पहले सिगमंड फ्रायड द्वारा वर्णित किया गया था, मनोचिकित्सा में एक घटना है जिसमें एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भावनाओं का अचेतन पुनर्निर्देशन होता है। स्थानांतरण को, सामान्य तौर पर, "किसी चीज़ या किसी व्यक्ति को एक स्थान, स्थिति, आदि से दूसरे स्थान पर ले जाने की प्रक्रिया" के रूप में परिभाषित किया गया है। अंतरण में परामर्शी का परामर्शकर्ता के प्रति धनात्मक प्रतिक्रिया रहती है। वह परामर्शकर्ता पर विश्वास करता है तथा उसे अपने भूतकालीन जीवन के महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखता है। वह उसे अपना अभिभावक समझकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है। स्थानांतरित भावनाओं के माध्यम से कार्य करना मनोगतिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानांतरण की प्रकृति परामर्शी के मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण सुराग प्रदान कर सकती है, प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से परामर्शकर्ता को उनके मानस में गहरे संघर्षों को हल करने में मदद मिल सकती है। अपने बाद के लेखन में, फ्रायड ने सीखा कि स्थानांतरण को समझना मनोचिकित्सात्मक कार्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। 1912 के "द डायनेमिक्स ऑफ ट्रांसफरेंस" नामक एक लेख में, फ्रायड ने यह स्पष्ट किया था कि स्थानांतरण एक अपरिहार्य प्रक्रिया है: "मैं यह जोड़ना चाहता हूं कि विश्लेषण के दौरान स्थानांतरण अनिवार्य रूप से उत्पन्न होता है और उपचार में अपनी प्रसिद्ध भूमिका निभाने के लिए आता है[5]

चिकित्सा में तीन प्रकार के स्थानांतरण होते हैं -

Ø  सकारात्मक स्थानांतरण

Ø  नकारात्मक स्थानांतरण

Ø  यौन अंतरण

सकारात्मक स्थानांतरण का एक उदाहरण है कि स्थानांतरण कभी-कभी एक अच्छी बात हो सकती है। जब आप अपने परामर्शदाता के साथ संबंधों के लिए अपने पिछले संबंधों के सुखद पहलुओं को लागू करते हैं। इसका सकारात्मक परिणाम हो सकता है क्योंकि आप अपने परामर्शदाता को को देखभाल करने वाले, बुद्धिमान और आपके बारे में चिंतित के रूप में देखते हैं। Autism and Transference: Case Study in a Brazilian Primary School में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे से जुड़े केस स्टडी में सकारात्मक स्थानांतरण के लाभों को देखा जा सकता है। एक बार सकारात्मक स्थानांतरण होने के बाद, परामर्शदाता के साथ युवा लड़के का बंधन मजबूत होने लगा और उसने उसके निर्देशों का पालन करना शुरू कर दिया, अपने आक्रामक व्यवहार को कम कर दिया, और उसकी सीखने की क्षमता विकसित हुई।[6]

नकारात्मक स्थानांतरण में परामर्शदाता को नकारात्मक भावनाओं का स्थानांतरण शामिल है। क्रोध और शत्रुता दो भावनाएँ हैं माता-पिता या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति के प्रति बचपन में महसूस की जा सकती हैं और यही भावनाएँ परामर्शग्राही द्वारा परामर्शकर्ता के प्रति व्यक्त हो सकती हैं। नकारात्मक संक्रमण बुरा लगता है लेकिन वास्तव में चिकित्सीय अनुभव को बढ़ा सकता है। एक बार एहसास हो जाने पर, परामर्शकर्ता  इस स्थानांतरण को चर्चा के विषय के रूप में उपयोग करने में सक्षम होता है, और रोगी की भावनात्मक प्रतिक्रिया की जांच करता है। यौन अंतरण, कभी-कभी ऐसा पाया गया है कि परामर्शी अपनी भावनाओं के व्यक्तीकरण में परामर्शदाता से इतना निकट आ जाता है कि वह उसके प्रति आकर्षण महसूस करने लगता है। इस प्रकार के आकर्षण में रोमांटिक या कामुक, श्रद्धा या पूजा की भावना तथा अंतरंग और यौन की भावना छुपी होती है। Erotic Transference in Therapy with a Lesbian Client (2015) शोध से पता चलता है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों के लिए यौन अंतरण अधिक आम हो सकता है, खासकर अगर उस व्यक्ति के कुछ दोस्त या अन्य लोग हैं जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं या भरोसा कर सकते हैं।[7]

5.6.4 अवरोध विश्लेषण (Analysis of Resistance)

देखा गया है परामर्शकर्ता को परामर्शी में आरम्भ में बड़ा सुधार दिखाई पड़ता है लेकिन बाद में गति अत्यधिक धीमी हो जाती है। यही अवरोध कहलाता है इसको परामर्शी के निम्न व्यवहार जैसे देर से आना, नहीं आना, अनुभवों के प्रकटीकरण में आनाकानी करना तथा विचारों को रोकना। जैसे ही अवरोध दिखे परामर्शकर्ता को तुरंत इसके उपाय में जुट जाना चाहिए। अवरोध विश्लेषण इसका उचित उपाय है।

फ्रायड ने 1949  में प्रकाशित पुस्तक ऍन आउटलाइन ऑफ़ साइकोएनालिसिस के छठवें अध्याय में इसके विषय में लिखा है कि यह स्पष्ट हो गया कि जो कुछ रोगजनक रूप से भुला दिया गया था उसे उजागर करने के कार्य को निरंतर और बहुत तीव्र प्रतिरोध के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा। रोगी ने आलोचनात्मक आपत्तियां इसलिए उठाईं, ताकि वह उन विचारों को संप्रेषित करने से बच सके जो उसके साथ घटित हुए थे, और जिसके विरुद्ध मनोविश्लेषण के मूल नियम को निर्देशित किया गया था, वे स्वयं पहले से ही इस प्रतिरोध की अभिव्यक्तियाँ थे। प्रतिरोध की घटना पर विचार करने से न्यूरोसिस के मनो-विश्लेषणात्मक सिद्धांत के कोने-पत्थरों में से एक - दमन का सिद्धांत सामने आया। यह मान लेना प्रशंसनीय था कि वही ताकतें जो अब सचेत किए जा रहे रोगजनक पदार्थ के खिलाफ संघर्ष कर रही थीं, उन्होंने पहले के समय में सफलता के साथ वही प्रयास किए थे[8]

5.6.5 स्पष्टीकरण (Interpretation)

स्पष्टीकरण प्रक्रम का अर्थ है परामर्शदाता को परामर्शग्राही की सोच, विचार, भावनाओं, तथ्यों को सही प्रकार से समझकर उनका विश्लेषण करना। इसके माध्यम से परामर्शदाता परामर्शग्राही को उसके भूत व वर्तमान निजी अनुभवों को स्वयं समझने तथा उनसे अनुकूल होने में मदद करता है। उसे स्पष्टीकरण का प्रयोग बहुत समझदारी से करना करना चाहिए। अगर वह प्रारम्भ में ही इस प्रक्रम का उपयोग करेगा तो परामर्श लेने वाला दूर हो जायेगा और अंत तक नहीं करेगा तो परामर्श लेने वाला अंतर्ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो पायेगा। इसलिए इसका प्रयोग तब करें जब परामर्शग्राही के वृद्धि और विकास पर कोई प्रभाव या अवरोध ने पड़े।

उपरोक्त व्यक्तित्व विश्लेषण की प्रविधियाँ दमित इच्छाओं से उलझे अंतःकरण को सुलझाने तथा मनुष्य को जीवन के आंतरिक उद्वेगों से मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होती हैं। व्यक्ति के रोग और जीवन का असंतुलन शारीरिक रोगों से इतना नहीं होता है जितना कि मनोरोगों से होता है। इन मानसिक गुत्थियों का सम्बन्ध उसके वर्तमान जीवन से ही नहीं वरन बीते हुए जीवन (जिसमें उसका बाल्यकाल भी सम्मिलित है) होता है। इतनी गहन गुत्थियों को सुलझाने के लिए इन विधियों की सहायता से गहरा उतरा जाता है।



[1] American Psychiatric Association https://www.psychiatry.org/patients-families/psychotherapy

[2] Novac, Andrei & Blinder, Barton J. (2021) Free association in psychoanalysis, London: Neuropsychoanalysis An Interdisciplinary Journal for Psychoanalysis and the Neurosciences, p. 55

[3] Freud, Sigmund (1955) The Interpretation of Dreams, New York: Basic Book Publication, p. 586

[4] शुक्ल, लालजी राम (1947) मानसिक चिकित्सा, बनारस : नंदकिशोर एंड ब्रदर्स, पृ० - 127

[5] Freud, Sigmund (1912) The Dynamics of the Transference, unpublished, p.313

[6] Geraldo A. Fiamenghi Jr (2019) EAS Journal of Psychology and Behavioural Sciences, Kenya: East African Scholars Publisher, p. 84-89

 

 

[7] Devi KD, Manjula M, Math SB (2015) Erotic Transference in Therapy with a Lesbian Client., Bangalore: Ann Psychiatry Mental Health, p. 1029

[8] Freud, Sigmund (1949) An Outline of Psychoanalysis, New York: W. W. Norton, p. 57

फ्रायड के मनोवैज्ञानिक विचारों का विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में अध्ययन ( Stage of Personality Development)

विद्यार्थी जीवन ही मनुष्य के भावी जीवन की आधारशिला है। वैश्विक स्तर पर बालक के आधिकारिक रूप से विद्यार्थी कहलाने की आयु भिन्न-भिन्न देशों ...